बुधवार, 15 सितंबर 2021

*कियो भवानी कौल*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
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*दादू जिहिं विधि आतम उद्धरै, परसे प्रीतम प्राण ।*
*साधु शब्द क्यूँ निंदणां, समझैं चतुर सुजाण ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निन्दा का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*नरहरियानन्दजी*
*मूल छप्पय –*
*ध्रुव१ नरहरियानन्द की, माता से महिमा भई ॥*
*लगी झरन२ की झींक३, नन्द के नहीं बरीतो४ ।*
*हो दुर्गा को द्वार, शहर में सदन बदीतो५ ॥*
*राघव रूतो६ संत, मातु की छात उपारी ।*
*कियो भवानी कौल, भक्त गृह लकरी डारी ॥*
*पाड़ोसी हरि विमुख, संत के भोरे बूड़ो ॥*
*कूटे जाय कपाट, जालपा पकर्यो जूड़ो ॥*
*निज बदले की बेठ७ गहि,*
*नित साकत८ के शिर दिई ।*
*ध्रुव नरहरियानन्द की,*
*माता से महिमा भई ॥१७१॥*
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नरहरियानन्द जी का जन्म वैशाख कृ. ३ शुक्र को हुआ था । आप स्वामी रामानन्द जी के शिष्य थे । निश्चय१ ही नरहरियानन्द जी की महिमा एक दुर्गा माता द्वारा बढ़ी थी । सो बता रहे हैं - एक समय कई दिन से वर्षा२ की झड़ी३ लगी हुई थी । अन्नादि सामग्री तो सब थी किन्तु बनाने के लिये सूखा काष्ठ४ नहीं था । समय पर भगवान् के भोग लगाना था और संतों को जिमाना था । किन्तु सूखी लकड़ियों के बिना काम रुक रहा था । फिर उनको स्मरण आया कि दुर्गादेवी के मंदिर में बहुत सा काष्ठ लगा है । आज तो वहां से ही लाना चाहिये । यह निश्चय कर हाथ में कुल्हाड़ा ले शहर में दुर्गा देवी का प्राचीन५ मंदिर था ।
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उसके द्वार पर पहुँचकर, वे संत शूर६ दुर्गा माता के मंदिर की काष्ठ की छत उखाड़ने लगे । तब दुर्गा माता ने कहा - संत जी आप मेरा घर मत गिराओ, आपके यहां नित्य सूखी लकड़ियों की एक भारी मैं डाल आया करूंगी । आप बहुत अच्छा कहकर लौट गये । दुर्गा माता संतों के प्रतिदिन लकड़ियां डालने लगीं ।
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एक हरि विमुख पड़ोसी को यह ज्ञात हो गया । तब उसने भी भोले पन से संत के समान दुर्गा के मंदिर में जाकर कपाटों को कुल्हाड़ी की चोट मारी । तब जालपा दुर्गा ने उसकी चोटी पकड़ ली ।
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छोड़ने की प्रार्थना करने पर नरहरियानन्द के लकड़ियाँ प्रतिदिन पहुँचाने की जो अपनी बेगार७ थी वह उसने स्वीकार की कि प्रतिदिन एक भारी नरहरियानन्द जी के डाल आऊंगा तब अपनी बेगार उस अभक्त८ के शिर पर धर कर उसको छोड़ दिया । वह प्रतिदिन पहुँचाने लगा । इस प्रकार नरहरियानन्द जी की महिमा माता ने बढाई थी ।
(क्रमशः)

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