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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १६९/१७२*
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सतसंगति सुख ऊपजै, काल कुसंगति खाइ ।
कहि जगजीवन नांउ रत, नांउं हि मांहि समांइ ॥१६९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सत्संग से सुख मिलता है ओर कुसंग से कालग्रसित होते हैं । जो स्मरण में रत होते हैं वे उसी में समा जाते हैं ।
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सतसंगति सुख ऊपजै, समझ्या घट लहै रांम ।
कहि जगजीवन बिबेकी, नूर पिवै भजि नांम ॥१७०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सत्संग में ही सुख है । और इसे समझने से ह्रदय में राम विराजमान रहते हैं । जो विवेकी जन हैं वे प्रभु तेज का पान स्मरण द्वारा ही करते हैं ।
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अनभै आई सोइ गवांई, ताथैं नाहीं नांम ।
कहि जगजीवन रांम कहै, तो सुखी रहै सब ठांम ॥१७१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो संतो से अनुभव पाया उसे यूं ही गंवा दिया। उससे प्रेरित हो स्मरण करना चाहिए था । अगर राम नाम का स्मरण करते तो सदा सर्वत्र सुखी रहते ।
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कहि जगजीवन कुसंगति, सुणिये सबद अनेक ।
सतसंगति मंहि साषि हरि, आतम परसै एक ॥१७२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कुसंग में हम अनेक भांति के शब्द सुनते है जो प्रयोजन रहित होते हैं । और सत्संग में प्रभु स्मरण होता जिससे प्रभु का सानिध्य मिलता है ।
(क्रमशः)

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