मंगलवार, 14 सितंबर 2021

*१८. साध को अंग ~ १६५/१६८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १६५/१६८*
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कहि जगजीवन क्रम४ मांहि, अक्शर लिख्या अगाध । 
कोई जन बांचै जतन करि, रांम कहै सुणि साध ॥१६५॥
{४. क्रम=कर्म(भाग्य)} 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भाग्य में कितने ही लेख लिखे हैं कोइ विरला ही इनको पढ सकता है । और राम का नाम ले सकता है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, सबद साखि हरि नांम । 
जिन मंहि एही ऊपजै, चित्त राखै तिहिं ठांम ॥१६६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जितने भी पद व साखी हैं उनमें प्रभु का ही नाम है । जहाँ पर यह अनुभव हो हमें अपना चित वहां ही स्थिर करना चाहिए ।
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कहि जगजीवन रांमजी, नवां पुरानां होइ । 
अति उत्तम अंग बिराजै, हरि जल सौं नित धोइ ॥१६७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु सभी नूतन पुरातन होता है सबसे श्रेष्ठ वह है जो मन में विराजमान है और जिन्हें रोज स्मरण से स्नान कराया जाता है ।
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हरिजन कूं नित बंदिये, ज्यूं दुतिया कौ चंद५ । 
कहि जगजीवन नांउ भजि, जे कोई बिंदै६ ब्यंद७ ॥१६८॥
(५. दुतिया कौ चंद=दूज का चांद)   (६. बिंदै=रक्षा करता हुआ)    (७. ब्यंद=स्वकीय वीर्य की बिन्दु)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो परमात्मा के प्यारे हैं उनको भी द्वितीया तिथि के चन्द्र की भांति शुभ मानकर उनकी वंदना करनी चाहिए । स्मरण ऐसे यत्न से करना चाहिए जैसे कोइ जन अपने जीव तत्त्व की रक्षा करता है ।
(क्रमशः)

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