शनिवार, 18 सितंबर 2021

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*दादू मार्ग महर का, सुखी सहज सौं जाइ ।*
*भवसागर तैं काढ कर, अपणे लिये बुलाइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ ५ अर्चना भक्ति ॥*
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*॥ पूजक के दोष दूर करके उसे हरि अपनाते हैं ॥*
पूजक के हत दोष को, अपनाते हरि आप ।
अल्ह को अपनाय के, कीन्हा प्रगट प्रताप ॥१४३॥
दृष्टांत कथा – कूल्ह और अल्ह दो भाई थे । कूल्ह बड़े और भगवत् ध्यानादि में ही मग्न रहते थे । भगवत् कीर्तन के पध्य भी रचा करते थे । अल्ह मांस मदिरा आदि खाते पीते थे और प्राय: राजाओं का यश ही गया करते थे । कभी २ घुनाक्षर न्याय से भगवत् कीर्तन के पध्य भी रच दिया करते थे ।
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बड़े भाई ने कहा – 'नर जन्म दुर्लभ है, चलो द्वारिका भगवान् के दर्शन कर आवें । दोनों गए कूल्ह नें अपनी रचनाएं भगवान् के भेंट की । अल्ह भी लज्जित से होकर तथा आँखों में आँसू भर करके अपराध मोचन के निमित्त भगवत् स्तुति के कुछ पध्य पढ़ने लगे ।
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भगवान् भी इनकी रचना को हुंकारा देते हुए सुनने लगे और पुजारी को आज्ञा दी कि – 'मेरे गले की पुष्पमाला अल्ह को दो ।' अल्ह ने पुजारी से कहा – ' कूल्ह बड़े हैं यह इन्हें ही मिलनी चाहिए ।' पुजारी – 'बड़े छोटे की बात यहां नहीं है, यहां तो हृदय की प्रीति की पहचान होती है और मुझे तो आज्ञा पालन करना है ।' यह कह कर माला अल्ह के गले में डाल दी ।
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यह देखकर कूल्ह के मन में विचार उठा कि देखो, इस विषयी को तो भगवान् ने माला दी और मैं सदा भजन में ही लगा रहता हूँ उसे कुछ नहीं । वे दुखी होकर समुद्र में कूद पड़े और मुख्य द्वारिका में पहुंच कर भगवत् दर्शन से कृतार्थ होगये । भोजन के समय भगवान् ने कहा – 'तुम्हारे पास एक पत्तल और लगाओ ।' कूल्ह – 'किस लिये !' भगवान् – 'अल्ह के लिए ।'
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यह सुनकर फिर कूल्ह को दु:ख हुआ । भगवान् ने कहा – 'दु:ख की कोई बात नहीं है, यदपि अल्ह का वर्तमान व्यवहार ठीक नहीं भी दिखता तो भी उसने पूर्व जन्म में मेरी बहुत पूजा की थी । वह राजा था राज्य का त्याग करके बन में जाकर मेरी सेवा पूजा में ही रहता था ।
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एक समय एक दूसरा राजा उसके पास आया था, उसके कुसंग से अल्ह के मन में भोग वासना जाग उठी थी इसी लिए उसे यह शरीर मिला है । अब उसके सब दोष नष्ट हो जायेगें और वह मुझे ही प्राप्त होगा ।' अब कूल्ह का संशय दूर हो गया । इससे सूचित होता है कि भगवान् अपने पूजक के दोष नष्ट करके उसे अपना लेते हैं ।

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