बुधवार, 15 सितंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०६

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०६)*
.
*१०६. अनन्य शरण । मल्लिका मोद ताल*
*तूँ ही तूँ गुरुदेव हमारा, सब कुछ मेरे नाम तुम्हारा ॥टेक॥*
*तुम हीं पूजा, तुम हीं सेवा, तुम हीं पाती, तुम हीं देवा ॥१॥*
*योग यज्ञ तूँ साधन जापं, तुम हीं मेरे आपै आपं ॥२॥*
*तप तीरथ तूँ व्रत स्नाना, तुम हीं ज्ञाना तुम हीं ध्याना ॥३॥*
*वेद भेद तूँ पाठ पुराणा, दादू के तुम पिंड पराणा ॥४॥*
.
भा० दी०-हे प्रभो ! सत्यं वदामि, त्वमेव मे गुरुः, तव नामैव मे सर्वस्वम् । त्वमेव मे सेवाऽर्चनं पूजा च । तुलसीपत्रार्पणस्थानं त्वमेव मे इष्टदेवतुल्यम् । त्वमेव मे योगयज्ञादिसाधनस्वरूपम् । जपस्तपः पुष्पञ्च त्वमेवासि । त्वमेव तीर्थ त्वमेव ब्रतस्नानध्यानाद्यास्पदम् । वेदपठनं पुराणादिश्रवणमपि त्वमेव किं बहुना मम शरीरे त्वं जीवितायमानोऽसि ।
उक्तंहि-भागवते अष्टम स्क.
अनाद्यविद्योपहतात्म संविदस्तन्मूलसंसारपरिश्रमातुराः ।
यदृच्छयेहोपस्ता यमाप्नुयुर्विमुक्तिदो न: परमो गुरुभवान् ॥
न यत्प्रसादायुतभागलेशमन्ये च देवा गुरवो जना: स्वयम् ।
कर्तुं समेताः प्रभवन्ति पुंसस्तमीश्वरं त्वां शरणं प्रपद्ये ॥
त्वं सर्वलोकस्य सुहृत् प्रियेश्वरो ह्यात्मा गुरुर्ज्ञानमभीष्टसिद्धिः ।
तथाऽपि लोको न भवन्त मन्दधीर्जानाति सन्तं हृदि बद्धकामः ॥
तं त्वामहं देववरं वरेण्यं प्रपद्य ईशं प्रतिबोधनाय ।
छिन्ध्यर्थदीपैर्भगवन् वचोभिर्ग्रन्थीन् हृदय्यान् विवृणुस्वमोकः ॥
.
मैं आप से सत्य ही कहता हूँ कि आप ही मेरे गुरुदेव हैं । आपका नाम ही मेरा सर्वस्व है । आपकी पूजा, सेवा, तुलसी पत्र चढाना, ये सब क्रियाएँ गुरुदेव रूप ही हैं । योग, याग, आदि साधन तथा जप, तप भी आप स्वयं ही हैं । मेरे लिए तप, तीर्थ, व्रत, स्नान, ध्यान. ज्ञान, वेद का पाठ पढना, पुराणों का श्रवण, ये सब आप ही हैं । अधिक क्या कहूं, मेरे शरीर में प्राण भी आप ही हैं । यह ही अनन्य भक्ति है ।
.
राजा सत्यव्रत ने कहा कि हे प्रभो ! जीवों का आत्म-ज्ञान अनादि, अविद्या से ढक गया है । इसी कारण ये संसार के प्राणी अनेकानेक क्लेशों से पीड़ित हो रहे हैं । जब अनायास ही आपके अनुग्रह से ये आपकी शरण में पहुँच जाते हैं, तब आपको प्राप्त कर लेते हैं । अतः बन्धन से छुड़ाकर मुक्ति देने वाले वास्तविक गुरु आप ही हैं ।
.
जितने भी देवता, गुरु और संसार के दूसरे जीव हैं, वे सब यदि स्वतन्त्र रूप से या सब मिलकर भी कृपा करें तो आपकी कृपा के दश हजारवें अंश की भी बराबरी नहीं कर सकते । अतः हे प्रभो ! आपही सर्वशक्तिमान् हैं । मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ ।
आप सारे लोकों के सुदृढ़ प्रियतम ईश्वर और आत्मा हैं । गुरु तथा उनके द्वारा प्राप्त होने वाला ज्ञान और अभीष्ट की सिद्धि भी आपके ही स्वरूप हैं ।
.
फिर भी कामनाओं के बन्धन में जकड़े जाकर लोग अन्धे हो रहे हैं । उन्हें इस बात का पता ही नहीं कि आप उनके हृदय में ही विराजमान हैं । आप देवताओं के भी आराध्यदेव परमपूजनीय परमेश्वर हैं । मैं आप से ज्ञान प्राप्त करने के लिये आपकी शरण में आया हूं । हे भगवान्-आप परमार्थ को प्रकाशित करने वाली अपनी वाणी से मेरे हृदय की ग्रन्थि को काट डालिये और अपने स्वरूप को प्रकाशित कीजिये ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें