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*‘पाया पाया’ सब कहैं, केतक ‘देहुँ दिखाइ’ ।*
*कीमत किनहूँ ना कही, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~हैरान का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(३) साकार-निराकार की कथा । चीनी का पहाड़*
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केदार और कई भक्त घर जाने के लिए उठे । केदार ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया, और कहा, आज्ञा हो तो अब चले ।
श्रीरामकृष्ण - तुम अधर से बिना कहे ही चले जाओगे, अभद्रता न होगी ?
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केदार - तस्मिन् तुष्टे जगत् तुष्टम् । जब आप रहे तो सब का रहना हुआ । अभी मेरी तबीयत भी कुछ खराब है और फिर विवाह आदि के लिए जरा कुछ डर भी लगता है । समाज ही तो है - एक बार गड़बड़ हो भी चुका है ।*(*अधर केदार की अपेक्षा कुछ नींवी जाति के थे । केदार ब्राह्मण थे इसलिए वे न तो अधर के घर पर खा सकते थे और न उनके साथ ही ।)
विजय - क्या इन्हें(श्रीरामकृष्ण को) छोड़कर जायेंगे ?
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इसी समय श्रीरामकृष्ण को ले जाने के लिए अधर आये । भीतर पत्तलें पड़ चुकी थीं । श्रीरामकृष्ण उठे । विजय और केदार से कहा - "आओ जी मेरे साथ ।" विजय, केदार और दूसरे भक्तों ने श्रीरामकृष्ण के साथ बैठकर प्रसाद पाया ।
भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण एक बार फिर बैठकखाने में आकर बैठे । केदार, विजय और दूसरे भक्त चारों ओर बैठे ।
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केदार ने हाथ जोड़कर बड़े ही विनयपूर्ण शब्दों में श्रीरामकृष्ण से कहा - मैं टाल मटोल कर रहा था, मुझे क्षमा कीजिये ।'
केदार ढाका में काम करते हैं । वहाँ बहुत से भक्त उनके पास आते हैं और उन्हें खिलाने के लिए सन्देश आदि बहुत तरह की चीजें ले आया करते हैं । केदार यही सब बातें श्रीरामकृष्ण से कह रहे हैं ।
केदार - (विनयपूर्वक) - बहुत से आदमी खिलाने के लिए आते हैं । क्या करूँ ? कोई आज्ञा दीजिये ।
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श्रीरामकृष्ण - भक्ति होने पर चाण्डाल का भी अन्न खाया जा सकता है । सात वर्ष की उन्माद-अवस्था के बाद मैं उस देश में(कामारपुकुर) गया । तब कैसी कैसी अवस्थाएँ थीं ! वेश्याओं तक ने खिलाया, परन्तु अब वह सब नहीं होता । केदार जाने को उठे ।
केदार - (धीमी आवाज में) - महाराज, आप मुझ में कुछ शक्ति-संचार कर दीजिये, बहुत से लोग मेरे पास आते हैं, मुझे क्या ज्ञान है ?
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श्रीरामकृष्ण - अजी, सब हो जायगा, आन्तरिक भक्ति के रहने पर सब हो जाता है ।
केदार के बिदा होने के पहले बंगवासी के सम्पादक श्रीयुत योगेन्द्र ने आकर प्रवेश किया । श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके उन्होंने आसन ग्रहण किया । साकार निराकार की बात होने लगी ।
श्रीरामकृष्ण – वे साकार हैं, निराकार हैं और भी क्या क्या हैं, यह सब हम लोग क्या जानें ? केवल निराकार कहने से कैसे काम चलेगा ?
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योगेन्द्र – ब्राह्म-समाज की एक बात बड़े आश्चर्य की है । बारह वर्ष का लड़का है, उसे भी निराकार ही सूझता है ! आदि-समाजवाले साकार पर विशेष आपत्ति नहीं करते । दुर्गा पूजा के समय वे लोग भलेमानसों के घर भी जा सकते हैं ।
श्रीरामकृष्ण - (हँसकर) - उन्होंने ठीक कहा, उसे भी निराकार ही सूझता है !
अधर - शिवनाथ बाबू साकार नहीं मानते ।
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विजय - वह उनके समझने की भूल है । ये जैसा कहते हैं, गिरगिट कितने ही रंग बदलता रहता है; जो पेड़ के नीचे रहता है, वही जान सकता है । मैंने ध्यान करते हुए मूर्तियाँ देखी । कितने ही देवता थे ! उन्होंने बहुत कुछ कहा । मैंने मन में कहा, "मैं उनके(श्रीरामकृष्ण के) पास जाऊँगा, ये बातें तभी मेरी समझ में आयेंगी ।’
श्रीरामकृष्ण - तुमने ठीक देखा है ।
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केदार - भक्तों के लिए वे साकार हैं । भक्त प्रेम से उन्हें साकार देखता है । ध्रुव ने जब उनके दर्शन किये, तब पूछा, आपके कुण्डल क्यों नहीं हिल रहे हैं ? श्रीठाकुरजी ने कहा, हिलाओं तो हिलें ।
श्रीरामकृष्ण - सब मानना चाहिए जी - निराकार और साकार सब मानना चाहिए । काली-मन्दिर में ध्यान करते हुए मैंने देखी, एक वेश्या । मैंने कहा, माँ, तू इस रूप में भी हैं । इसीलिए कहता हूँ, सब मानना चाहिए । वे कब किस रूप से दर्शन देते हैं, सामने आते हैं, यह कहा नहीं जा सकता ।
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यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाने लगे । गाना हो जाने पर विजय ने कहा, 'वे अनन्तशक्ति हैं - क्या किसी दूसरे रूप से दर्शन नहीं दे सकते ? कितने आश्चर्य की बात है ! लोग रेणु की रेणु जो हैं, फिर भी वे समझ बैठते हैं कि ईश्वर के सम्बन्ध में सब कुछ जान लिया ।
श्रीरामकृष्ण कुछ गीता, भागवत और वेदान्त पढ़कर लोग सोचते हैं, हमने सब समझ लिया । चीनी के पहाड़ पर एक चींटी गयी थी । एक दाना खाने से ही उसका पेट भर गया । एक दाना और मुँह में दबाकर वह घर लौट पड़ी । जाते हुए सोच रही थी, अबकी बार आकर सारा पहाड़ उठा ले जाऊँगी ! (सब हँसते हैं ।)
(क्रमशः)

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