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*दादू मिश्री मिश्री कीजिये, मुख मीठा नाहीं ।*
*मीठा तब ही होइगा, छिटकावै माहीं ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*कर्म कब तक ? प्रथम माया के संसार का त्याग, फिर ब्रह्मज्ञान*
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"कर्म कब तक है ? जब तक देहाभिमान रहता है अर्थात् देह ही मैं हूँ, यह बुद्धि रहती है । यह बात गीता में लिखी है ।
"देह पर आत्मा-बुद्धि का आरोप करना ही अज्ञान है ।
(शिवपुर के ब्राह्मभक्त से) "आप क्या ब्राह्म है ?"
ब्राह्म - जी हाँ ।
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - मैं निराकार साधक का मुँह और उसकी आँखें देखकर उसे समझ लेता हूँ । आप जरा डूबिये; ऊपर उतराते रहियेगा तो रत्न आपको नहीं मिल सकता । मैं साकार और निराकार सब मानता हूँ ।
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बड़ाबाजार के मारवाड़ी भक्तों ने आकर प्रणाम किया । श्रीरामकृष्ण उन लोगों की प्रशंसा कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण - (भक्तों से) – अहा ! ये सब कैसे भक्त हैं ! सब के सब श्रीठाकुरजी के दर्शन करते हैं, स्तुतियाँ पढ़ते हैं और प्रसाद पाते हैं । इस बार इन लोगों ने जिसे पुरोहित रखा है, वह भागवत का पण्डित है ।
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मारवाड़ी भक्त – ‘मैं तुम्हारा दास हूँ’, यह जो कहता है वह 'मैं' कौन है ?
श्रीरामकृष्ण – लिंग-शरीर या जीवात्मा है । मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार, इन चारों के मेल से लिंग-शरीर होता हैं ।
मारवाड़ी - जीवात्मा कौन हैं ?
श्रीरामकृष्ण - अष्ट-पाशों से बँधा हुआ आत्मा; और चित्त उसे कहते हैं जो (किसी चीज की याद आने पर) 'अहा' कर उठता है ।
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मारवाड़ी भक्त - महाराज, मरने पर क्या होता है ?
श्रीरामकृष्ण - गीता के मत से मरते समय जीव जो कुछ सोचता है, वही हो जाता है । भरत ने हरिण सोचा था, इसलिए वह वही हो भी गया था । यही कारण है कि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए साधना की आवश्यकता है । दिन-रात उनको चिन्ता करते रहने पर मरते समय भी उन्हीं की चिन्ता होगी ।
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मारवाड़ी भक्त - अच्छा, महाराज, विषय से वैराग्य क्यों नहीं होता ?
श्रीरामकृष्ण - इसे ही माया कहते हैं । माया से सत् असत् और असत् सत् जान पड़ता है ।
“सत् अर्थात् जो नित्य है - परब्रह्म हैं । असत् संसार है - अनित्य है ।
"पढ़ने से क्या होता है ? साधना और तपस्या चाहिए । उन्हें पुकारो ।
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"‘भंग-भंग चिल्लाने से क्या होगा ? कुछ पीना चाहिए ।
"यह संसार काँटे के पेड़ की तरह है । हाथ लगाओं तो खून निकल आता है । अगर काँटे के पेड़ के सम्बन्ध में बैठे ही बैठे यह कल्पना करते रहें कि पेड़ जल गया, तो क्या इससे वह कभी जला जाता है ? ज्ञानाग्नि लाओ, वही आग लगाओ, तब पेड़ कहीं जल सकता है ।
"साधना की अवस्था में कुछ परिश्रम करना पड़ता है । फिर तो सीधा मार्ग है । मोड़ पार करके अनुकूल वायु में पाल लगाकर नाव छोड़ दो ।
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"जब तक माया के घेरे के भीतर हो, जब तक माया के मेघ हैं, तब तक ज्ञान-सूर्य की किरणें नहीं फैल सकतीं । माया का घेरा पार कर जब बाहर आकर खड़े हो जाओगे तब ज्ञान-सूर्य अविद्या का नाश कर देगा । घर के भीतर ले आने पर आतशी शीशे से कोई काम नहीं हो सकता । घर के घेरे से बाहर खड़े होने पर जब धूप उस पर गिरती है तब उसकी ज्वाला से कागज जल जाता है ।
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“और बादलों के रहने पर भी आतशी शीशे से कागज नहीं जलता । बादलों के हट जाने पर ही वह काम कर सकेगा ।
"कामिनी और कांचन के घेरे से जरा हटकर खड़े होने पर अलग रहकर कुछ साधना करने पर मन का अन्धकार दूर होता है - अविद्या और अहंकार के बादल हट जाते हैं - ज्ञान-लाभ होता है ।
"कामिनी और कांचन ही बादल हैं ।"
(क्रमशः)

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