गुरुवार, 23 सितंबर 2021

*करणी बिना ज्ञान का अंग १६३(५/८)*

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*अनेक चंद उदय करै, असंख्य सूर प्रकास ।*
*एक निरंजन नांव बिन, दादू नहीं उजास ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*करणी बिना ज्ञान का अंग १६३*
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जे आतम उर अंधगति, ज्ञान दीप कर धारि ।
रज्जब पड़सी कूप में, दीप न सकई ठारि ॥५॥
जो प्राणी अंधा हो, वह अपने हाथ में दीपक धारण करले तो क्या होगा ? वह तो कूप में पड़ेगा ही, बिना नेत्र दीपक उसे कूप से नहीं बचा सकता । वैसे ही ज्ञान के अनुसार धारण रूप कर्तव्य नहीं हो तो उस हृदय के अंध को ज्ञान संसार कूप से नहीं बचा सकता । वह संसार में ही भ्रमण करेगा ।
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रजनी माया मोह की, इन्द्री आभे१ मांहिं ।
रज्जब रति२ न सूझ ही, ज्ञान दृष्टि कछु नांहिं ॥६॥
अंधेरी रात्रि हो और आकाश में गहरे बादल१ छाये हों तब दृष्टि कुछ काम नहीं देती, उससे किंचित२ भी नहीं दीखता । वैसे ही माया मोह रूप रात्रि में, इन्द्रियों की चंचलता रूप बादल हृदय में छाये हुवे हो तब ज्ञानदृष्टि कुछ काम नहीं देती, उससे किंचित मात्र भी ब्रह्म साक्षात्कार नहीं होता ।
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रज्जब ज्ञान दीप नहिं दूरि ह्वै, तिमिर पिंड ब्रह्मण्ड ।
जब लग मिल हि न राम रवि, जिनकी ज्योति प्रचंड ॥७॥
जब तक जिनका प्रचंड प्रकाश है वे सूर्य उदय नहीं होते तब तक दीपक से ब्रह्माण्ड का अंधेरा दूर नहीं होता । वैसे ही जब तक राम नहीं मिलते तब तक परोक्ष ज्ञान से हृदय का अज्ञानांधकार दूर नहीं होता ।
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रज्जब प्राणि पिपीलिका१, ज्ञान पंख परकाश२ ।
वह नहिं मिलै अविगति३ को, वह न जाय आकाश ॥८॥
चींटी१ के पंख प्रकट२ होते हैं पर वह उनसे आकाश में अधिक ऊंची नहीं जा सकती । वैसे ही प्राणी को धारण रूप कर्तव्य रहित परोक्ष ज्ञान प्राप्त होता है तब वह ब्रह्म३ को प्राप्त नहीं होता, कुछ मनुष्यों के पास ही ज्ञान कहला सकता है ।
(क्रमशः)

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