गुरुवार, 16 सितंबर 2021

*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१(१३/१६)*

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*तेरा सेवक तुम लगै, तुम्हीं माथै भार ।*
*दादू डूबत रामजी, बेगि उतारो पार ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१*
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पाप करत पातक चढै, पुण्य प्रकटत घट जांहिं ।
रज्जब मैले कूप खणि, तिहिं निर्मल जल न्हांहि ॥१३॥
जैसे कूप खोदने से तो खोदने वाला मैला हो जाता है, किंतु उसी के जल से स्नान करने पर निर्मल हो जाता है । वैसे ही पाप कर्म करने से तो पाप चढते हैं और पुण्य कर्म करने से पुण्य प्रकट होने पर पाप कम हो जाते हैं ।
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चोरी की तब चोर है, धर्म करत ह्वै साध ।
भाव फिरत भावी फिरी, तिन हुँ मुक्ति फल लाध ॥१४ ॥
चोरी की तब चोर है ऐसा बोलते थे फिर वही धर्म करता है तब साधु कहलाता है । देखो, भाव बदलते ही होनहार भी बदल जाता है और पूर्व जो चोर था उसी को मुक्ति रूप फल प्राप्त होता है ।
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कुकृत१ करि सुकृत करै तो, कुकृत लागै नाहिं ।
चोर हु छूटे पुण्य बल, समझ देखि मन मांहिं ॥१५॥
कुकर्म करके पुण्य कर्म करता है तब कुकृत का फल उसे नहीं लगता, पुण्य कर्म से नष्ट हो जाता है । पुण्य के बल से चोर भी मुक्त हो गये हैं, यह तुम भी विचार द्वारा मन में देख सकते हो ।
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गुरु गोविन्द रु देव ॠषि, सेवा सबै दयाल ।
पूजा करि पापी तिरे, सब हुं करी प्रतिपाल ॥१६॥
गुरु गोविन्द, देव ॠषि, सेवा से सभी दयालु होकर दया करते हैं । गुरु आदि की पूजा करके पापी भी तिर गये हैं सभी ने अपने सेवकों की रक्षा करी है ।
(क्रमशः)

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