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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १७७/१८०*
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सज्जन परगुन प्रीति हरि, गुर सेवा गुन गाइ ।
कहि जगजीवन ब्रह्म मत, ब्रह्म ग्यांन ब्रह्म पाइ ॥१७७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भले संतो का गुणगान, प्रभु से प्रेम, गुरु जी की सेवा व प्रभु महिमा यह सब ब्रह्म मत है, इसे अपना कर ब्रह्म ज्ञान पाया जा सकता है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, सोधि ह्रिदै सुख पाइ ।
साध तिरै मुनि ऊधरै, सेवग सेवै भाइ३ ॥१७८॥
(३. सेवग सेवै भाइ=सेव्य सेवक भाव से)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि है प्रभु आपकी खोज से मन सुखी होता है । इससे साधु जन भव तैर पाते हैं मुनि जन पार उतरते हैं । और सेवक सेवाभाव से सेवा करते हैं ।
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कहि जगजीवन रांमजी, पंच पदारथ षोडि४ ।
प्रांन परष बिन गमांवै, कोड़ी साटै कोडि५ ॥१७९॥
४. खोडि=निःसार, निस्तत्त्व । ५. कोडि=कोटि(=करोड़) ।
संतजगजीवन जी कहते हैं कि है प्रभु ये पंचभूतो से बना शरीर निःसार है । इसे पाकर भी परमात्मा को नहीं पाया तो जीव की स्थिति कौड़ी के बदले करोड़ों गंवाने जैसी है ।
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कहि जगजीवन दुनी मंहि, दांम चांम अरु कांम ।
ए त्रिय६ त्यागै हरि भजै, सो जन पावै रांम ॥१८०॥
(६. त्रिय=तीन)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस संसार में धन सौन्दर्य और कामनाओं को ही महत्व देते हैं अतः हे जीव इन तीनों को त्याग कर हरिजी का भजन करने से ही राम जी को पा सकते हैं ।
(क्रमशः)

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