शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

*पद्मावतीजी*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
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*दादू तो तूं पावै पीव को, मैं मेरा सब खोइ ।*
*मैं मेरा सहजैं गया, तब निर्मल दर्शन होइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ जीवित मृतक का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*पद्मावतीजी*
*मूल मनहर -*
*यह हित रज१ खानि मिली आन हित जानि,*
*स्वामी रामानन्द गुरु शिष पदमावती ।*
*मन को उतार्यो मान उरमी२ उद्यम आन,*
*बिसरे न राम राम रहै गुन गावती ॥*
*गुरु को शबद उर धर्म को बसायो पुर३,*
*ज्ञान ध्यान शील सत ओर वृत्ति जावती ।*
*राघो कहै काशी मध्य हाथी जीयो हाथ देत,*
*प्रसिद्ध प्रवीन भई आपो न जनावती ॥१७३॥*
पद्मावतीजी का जन्म चैत्र शु. १३ गुरुवार को किसी राज' वंश में हुआ था । आप राणी थीं किन्तु भगवत् प्रेम के कारण तथा संतों के संग से ही मेरा हित होगा, ऐसा जानके, स्वामी रामानन्दजी की शिष्या बनकर पंचम खानि रूप संतों में आ मिली थी । (संत सृष्टि अंडजादि चार खानियों से विलक्षण शब्द के द्वारा होती है, इससे इसे पंचम खानि कहा जाता है)
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और सत्संग के प्रभाव से मन का सम्मान चाहने वाला भाव मन से आपने हटा दिया था । हर्ष-शोकादि२ द्वन्द्वों को और भग -वान् से विमुख करने वाले उद्यमों को आप भूल गई थीं अर्थात् उनमें प्रवृत्त नहीं होती थीं किन्तु राम राम करना नहीं भूलती थीं और सदा भगवत् गुण गान करती रहती थीं ।
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गुरु रामानन्दजी का शब्द हृदय में धारण करके भागवद् धर्म के साधनों का समूह३ हृदय में बसा लिया था अर्थात् उनके अन्तःकरण में निरन्तर दैवी गुणों का निवास रहता था । उनकी वृत्ति-ज्ञान, ध्यान, शील और सत्य पर ही जाती थी ।
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काशी में एक दिन आप गंगा स्नान करके आ रही थीं । आगे एक मरा हुआ हाथी मार्ग में पड़ा था और जन समूह भी एकत्र था । आपने पूछा क्या बात है ? लोगों ने कहा - हाथी मर गया है । आपने पास जाकर इसका क्या मर गया है ? ऐसा कहते हुये उसके शरीर पर अपना वरद हस्त रक्खा कि वह उसी क्षण जीवित हो गया । इस प्रकार आप अति प्रसिद्ध हो गई थीं और अति चतुर भी थीं किन्तु इन सब बातों का अभिमान उनको लेशमात्र भी नहीं था । वे तो निर्मान होकर निरन्तर भगवद् भजन में ही निमग्न रहती थीं ।
(क्रमशः)

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