शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०८

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०८)*
.
*१०८. परिचय विनती । भंग ताल*
*नूर नैन भरि देखन दीजे,*
*अमी महारस भर भर पीजे ॥टेक॥*
*अमृत धारा, वार न पारा,*
*निर्मल सारा तेज तुम्हारा ॥१॥*
*अजर जरंता, अमी झरंता,*
*तार अनंता बहु गुणवंता ॥२॥*
*झिलमिल सांई, ज्योति गुसांई,*
*दादू मांही नूर रहांई ॥३॥*
.
भा० दी०-हे प्रभो ! त्वदीयं तेजोरूपं यथेष्टं द्रष्टुमिच्छामि । स्वस्वरूपामृतरसमाकण्ठं पातुमभिलषामि । भवत्तेज: स्वरूपं निर्मलं पूर्णामृतमनन्तमस्ति । नास्ति तस्यावधिः । भवाननन्तगुण-संपन्नोऽमृतधारावर्षी भक्तेभ्योऽमृतं प्रयच्छति । हे अनन्त ! पतितोद्धारक प्रभो ! भवज्ज्योति: सर्व-तोभावेन सर्वत्र भासते । मदीयेऽन्तःकरणेऽपि त्वदीयं ज्योति: प्रकाशते । तदेवाहमहर्निशं पश्यामि ।
उक्तञ्च श्वेताश्वतरो-
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥
.
हे प्रभो ! आपका जो तेजोमय रूप है, उसको मैं यथेच्छ देखना चाहता हूं । जो आपका स्वरुपामृत महारास है, उसका यथेच्छ पान करना चाहता हूं । आपका तेजोमय रूप निर्गुण, निर्मल, पूर्ण, अनन्त, अमृत स्वरूप है । उसका कहीं भी आदि, अन्त, मध्य नहीं दीखता है ।
.
आप अनन्त गुण संपन्न अमृत की धारा को वर्षाने वाले हैं, अमृत को देने वाले हैं । हे प्रभो ! आपने अनन्त प्राणियों का उद्धार किया है । आपकी ज्योति चारों तरफ भास रही है । मेरे अन्तःकरण में भी आपकी ज्योति भास रही है ।
.
श्वेताश्व में लिखा है कि –
उस हृदयस्थ परमेश्वर को जो धीर पुरुष निरन्तर देखते रहते हैं, उन्हीं को सदा रहने वाला परमानन्द प्राप्त होता है, दूसरों को नहीं । उसके प्रकाशित होने पर ही उसी के प्रकाश से सूर्य आदि सब प्रकाशित होते हैं । उसी के प्रकाश से संपूर्ण जगत् प्रकाशित होता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें