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*राम जपै रुचि साधु को, साधु जपै रुचि राम ।*
*दादू दोनों एक टग, यहु आरम्भ यहु काम ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*गाय चरावत देख खुसी द्विज,*
*भाव भयो जल नैन ढरै है ।*
*धाम सिधार सु राम रिझावत,*
*आपहु वा१ जिमि रीति करै है ॥*
*रीझ कहा हरि जाहु धना गुरु,*
*राम हि नन्द करो सु सिरै२ है ।*
*जाय भये शिष कंठ लगावत,*
*काम करै घर ध्यान धरै है ॥१६६॥*
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ब्राह्मण गायें चराते हुए भगवान् को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ । उसके हृदय में भक्ति भाव उत्पन्न हो गया । नेत्रों से प्रेमाश्रु पड़ने लगे ।
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फिर वह, अपने घर पर जाकर परम प्रेम से भक्ति करते हुए भली प्रकार राम को प्रसन्न करने लगा । ब्राह्मण उस१ धना की भक्ति की प्रीति रीति के समान ही प्रभु के साथ प्रीति करने लगा ।
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इधर एक दिन प्रभु ने प्रसन्न होकर घना को कहा - अब तुम काशी जाओ और स्वामी रामानन्द जी को गुरु बनाओ, ये अति उत्तम२ संत हैं ।
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भगवान् की आज्ञानुसार धना काशी जाकर रामानन्द जी के शिष्य हो गये । फिर घर जाकर प्रभु का प्रकट रूप में दर्शन करके चरणों में पड़ गये । भगवान् ने उठाकर कंठ लगाया अब आप घर का काम करते हुए भी हरि का ध्यान करने लगे ।
(क्रमशः)

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