शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

*सकाम निष्काम का अंग १५९(१३/१६)*

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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*मांही सूक्ष्म ह्वै रहै, बाहरि पसारै अंग ।*
*पवन लाग पौढ़ा भया, काला नाग भुवंग ॥*
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*सकाम निष्काम का अंग १५९*
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कामी क्वैलों१ की कला, बुझ्यों बुझी सो नांहिं ।
रज्जब अबला आगि मिल, एक मेक ह्वै जाँहिं ॥१३॥
कामी कोयलों१ की अग्नि की कला समान है । जैसे कोयलों की अग्नि बुझने पर भी नहीं बुझी के समान है । अग्नि से मिलते ही कोयले अग्नि रूप हो जाते हैं । वैसे ही कामी नारी से मिलते ही उसमें आसक्त हो जाता है ।
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दुर्मति दारू१ सौं भरे, वपु सु बाण विधि मांहिं ।
रज्जब त्रिगुणी२ जरे बिन, निश्चल उभय सु नांहिं ॥१४॥
जैसे अग्नि बाण में बारूद१ भरी रहती है, वैसे ही सकामी में दुर्बुद्धि भरी रहती है । बाण की बारूद जले बिना बाण पृथ्वी पर निश्चल नहीं होता । वैसे ही त्रिगुणात्मिका५ माया के जले बिना अर्थात हृदय से मायिक भावना निकाले बिना सकामी ब्रह्म में स्थिर नहीं हो सकता ।
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मुक्ति निराशा बंधन आस, घर वन मांहिं कहीं करि बास ।
एक ज्ञान घर एक अज्ञान, रज्जब समझे सुख दुख थान१ ॥१५॥
घर में तथा वन में कहीं भी रहो, निराशा से मुक्ति होती है, और आशा बंधन होता है । एक ज्ञान रूप घर है और एक अज्ञान रूप घर है, समझे हुये ज्ञानी को ज्ञान रूप घर में सुख रहता है । अज्ञानी को अज्ञान दुख का घर१ बना रहता है ।
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रज्जब खुले न व्योम बँध, मही न मुक्ता होय ।
पाताल सु फाँसी न कटै, आशा वश सब कोय ॥१६॥
आशा का बंधन आकाश में अर्थात स्वर्ग में भी नहीं खुलता, पृथ्वी में भी आशा से मुक्त नहीं होता, पाताल में भी आशा की फाँसी नहीं कटती, सुर, नर, नागादि सभी आशा के वश में हैं ।
(क्रमशः)

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