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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १३३/३६*
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उत्तम* अंन उत्तम उदिक, उत्तिम भाव अगाध ।
कहि जगजीवन सेवि हरि, सकल समरपै साध* ॥१३३॥
(*-*. साधु जनों की उत्तम श्रद्धा के साथ भगवान् की सेवा करते हुए उनको पवित्र अन्न एवं जल ही भेंट चढ़ाना चाहिये ॥१३३॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि साधु जन की भक्ति भाव उत्तम होना चाहिए । उन्हें ऊत्तम अन्न जल समर्पित करना चाहिए । तब ही वह भगवद् भाव कहलाता है ।
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कहि जगजीवन सौंज१ सब, सहज समरपै संत ।
भाव भगति भोक्ता अलख, क्रिपा करैं जहँ कंत ॥१३४॥
{१. सौंज=पूजा के सभी छोटे बड़े साधन(सामग्री)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सभी पूजा की सामग्री सभी संत सहज भाव से समर्पित करते हैं । व उसे ग्रहण भी प्रभु भाव से कृपा करके करते हैं । और भक्त उनके दर्शन रुपी नूर का पान करते हैं ।
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कहि जगजीवन रांमजी, तेज पुंज प्रकास ।
सांवै सांवत निरख हरि, नूर पिवै निज दास ॥१३५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सभी संत प्रभु का स्वरूप तेज भली प्रकार से दर्शन कर उस अमृत रुपी आनंद का रस पान करते हैं ।
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केई अवनि२ उतपति अनल३, केह मत पवन अकास ।
निज जन निकट निवास हरि, सु कहि जगजीवनदास ॥१३६॥
(२. अवनि=पृथ्वी) (३. अनल=अग्नि)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कोइ पृथ्वी, कोइ अग्नि, किसी का मत वायु व किसी का आकाश से जीव उत्पन्न होना है । किन्तु प्रभु तो जो दास भाव से भक्ति करते हैं उन्हीं के पास रहते हैं ।
(क्रमशः)

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