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*साधु निर्मल मल नहीं, राम रमै सम भाइ ।*
*दादू अवगुण काढ कर, जीव रसातल जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निन्दा का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*मू. इ. - साचै मतै सुरसुरानँद नाम ले,*
*काहु सौं मान गुमान न जाके ।*
*दोजगी१ दुष्ट दुशील२ इसे परि,*
*क्षोभ भरे जिव छिद्रन ताके ॥*
*वे निरदोष निपक्ष निरम्मल,*
*ताहु से खेचर३ खेचरि४ हाँके ।*
*राघो कहै भर५ भीर६ परे,*
*प्रकटे परमेश्वर बीच सभा के ॥१७०॥*
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सुरसुरानन्द जी सच्चे भाव प्रभु का चिन्तन करते थे । वे न किसी से सम्मान चाहते थे और न अभिमान रखते थे...
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किन्तु बुरे स्वभाव२ वाले दुष्ट नारकी१ प्राणी क्रोधादि से भरे हुए, दोषों को ही देखते रहते हैं ।
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वे ऐसे प्राणी जो निर्दोष, निर्पक्ष निर्मल संत जन होते हैं, उनसे भी वे दुष्ट३ दुष्टता४ ही हाँकते हैं अर्थात् करते हैं ।
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राघवदास जी कहते हैं भारी५ भीड़६(दुःख) पड़ने पर सभा के अर्थात् समूह मध्य परमेश्वर प्रकट हो गये और दुष्टों से पत्नी सहित सुरसुरानन्द जी की रक्षा की थी । एक समय सुरसुरानन्द और उनकी पत्नी घर छोड़कर वृन्दावन चले गये थे । वहां एक दिन मुसलमानों ने सुरसुरानन्द जी की पत्नी की सुन्दरता पर मोहित होकर उसको अपहरण करना चाहा था । तब संकट का समय जान दोनों ने प्रभु से प्रार्थना की । प्रार्थना सुनते ही उसी क्षण प्रभु नृसिंह रूप धारण करके प्रकट हो गये थे और दुष्टों का नाश कर सुरसुरी जी की रक्षा की थी ।
(क्रमशः)

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