रविवार, 19 सितंबर 2021

पहले है साधुसंग, फिर है श्रद्धा

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*दादू असाधु मिलै अन्तर पड़ै, भाव भक्ति रस जाइ ।*
*साधु मिलै सुख ऊपजै, आनन्द अंग न माइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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रामलाल उसके दूसरे दिन रुपये लौटा आया ।
"संन्यासी के लिए रुपये लेना या लोभ में फँस जाना कैसा है, जानते हो ? जैसे ब्राह्मण की विधवा बहुत दिनों तक आचार और ब्रह्मचर्य से रहकर एक दिन एक नीच शूद्र के साथ निकल गयी थी ।
"उस देश में भगी तेलिन के बहुत से चेले हो गये थे । शूद्र को सब लोग प्रणाम करते हैं, यह देखकर वहाँ के जमींदार ने उसके पीछे किसी बदमाश को भिड़ा दिया । उसने उसका धर्म नष्ट कर दिया । साधन-भजन सब मिट्टी में मिल गया । पतित संन्यासी भी वैसा ही है ।
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"तुम लोग संसारी हो, तुम्हारे लिए सत्संग की आवश्यकता है ।
"पहले है साधुसंग, फिर है श्रद्धा । साधु सन्त अगर उनका नाम न लें - उनका गुण न गायें, तो ईश्वर पर लोगों का विश्वास और श्रद्धा-भक्ति कैसे हो सकती है ? जब लोग तुम्हें तीन पुश्त का अमीर समझेंगे, तभी मानेंगे न ?
(मास्टर से) “ज्ञान के होने पर भी सदा अनुशीलन चाहिए । नागा(तोतापुरी) कहता था, लोटे को एक दिन मलने से क्या होगा ? डाल रखोगे तो फिर मैला हो जायगा ।"
“तुम्हारे घर एक बार जाना है । तुम्हारा अड्डा अगर मालूम रहा तो सम्भव है, वहाँ बहुत से भक्त आ मिलें । तुम ईशान के पास एक बार जाना ।
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(मणिलाल से) "केशव सेन की माँ आयी थीं । उनके घर के बालकों ने हरिनाम गाया । वे तालियाँ बजा-बजाकर उनकी प्रदक्षिणा करने लगीं । मैंने देखा, शोक से उन्हें बहुत दु:ख न था । यहाँ आकर वे एकादशी को माला लेकर जप करती थीं । मैंने देखा, उनमें बड़ी भक्ति है ।"
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मणिलाल - केशव बाबू के पितामह रामकमल सेन भक्त थे । तुलसी-कानन में बैठकर नाम-जप करते थे । केशव के पिता प्यारीमोहन भी वैष्णव भक्त थे ।
श्रीरामकृष्ण - बाप अगर वैसा न होता तो लड़का कभी इतना भक्त नहीं हो सकता । विजय की अवस्था देखो न ।
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"विजय का बाप भागवत पढ़ता था तब भावावेश में बेहोश हो जाता था । विजय भी कभी 'हो हो' कहता हुआ, उठकर खड़ा हो जाता था ।
“आजकल विजय जो कुछ दर्शन कर रहा है, सब ठीक है ।
“साकार और निराकार की बात विजय ने कही, जैसे गिरगिट का रंग लाल पीला हर तरह का होता है और फिर कोई भी रंग नहीं रहता, उसी तरह साकार और निराकार हैं ।
(क्रमशः)

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