रविवार, 19 सितंबर 2021

*झूठ साँच निर्णय का अंग १६२(५/८)*

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*जे पहुंचे ते कह गये, तिन की एकै बात ।*
*सबै सयानै एक मत, उनकी एकै जात ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*झूठ साँच निर्णय का अंग १६२*
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झूठ मरै सुन साँच में, साँच मरै सुन झूठ ।
रज्जब ज्यों थी त्यों कही, रजू१ होहु भावे रूठ ॥५॥
सत्य बात सुनकर उसमें स्थित होने पर झूठ नष्ट हो जाती है और झूठ सुनने पर सत्य नष्ट हो जाता है, इस बात पर प्रसन्न१ हो चाहे रुष्ट हो, जैसी स्थिति थी वैसी ही बात कही है ।
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जब लग प्राणी पिंड में, कण कूकस१ मधि होय ।
झूठ साँच दो मिल चलैं, तहां न दीसै दोय ॥६॥
जब तक जीव शरीर में है तब तक जैसे अन्नकण भूसा१ में होता है वैसे ही झूठ में साँच होता है, दोनों मिलकर चलते हैं उस स्थिति में दोनों भिन्न नहीं दीख पड़ते ।
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झुठों साँच समान है, समय सु समसरि१ होय ।
जन रज्जब इस पेच२ को, बूझै३ बिरला कोय ॥७॥
किसी समय झूठ भी सच्चे के समान है, ऐसी समानता हो जाती है । तब इस चक्कर को कोई बिरला ही ज्ञानी ही समझ पाता है । इसको अगली साखी में स्पष्ट कर रहे हैं ।
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तन मन आतम१ झूठ थे, लगे साँच को जाय ।
सो रज्जब साँचे भये, नर देखो निरताय२ ॥८॥
शरीर, मन, बुद्धि१, ये झूठ ही थे किंतु जिसके सत्य ब्रह्म के परायण हो गये वे सच्चे हो गये । हे नर ! यह बात तू भी विचार२ द्वारा देख सकता है ।
(क्रमशः)

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