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*नखसिख सब सुमिरण करैं, ऐसा कहिये जाप ।*
*अन्तर बिगसै आत्मा, तब दादू प्रगटै आप ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ ५ अर्चना भक्ति ॥*
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*॥ प्रभु अपने पूजक का मानसी भोग भी जीमें ॥*
प्रभु पूजक का मानसी, जीमें भोग अघाय ।
संतदास का खा कहा, अब नहिं जीमा जाय ॥१३९॥
दृष्टांत कथा – निवाई ग्राम के भक्त सन्तदासजी के मन में एक दिन इच्छा हुई । भगवान् के छप्पन प्रकार का भोग लगाना चाहिये । वाह्यभोग तो वे शीघ्रतर जुटा नहीं सके । मानसी छप्पन भोग तैयार करके श्रीजगन्नाथजी के भोग लगाया । भगवान् ने भी भक्त का वह प्रेम का भोजन तृप्त होकर जीमा ।
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उस दिन मन्दिर में भोग के समय भोग नहीं लगा । भगवान् ने स्वप्न में राजा से कहा _ 'आज हमारा भोजन सन्तदास के घर था । उसने बहुत जिमा दिया है, इस लिये हमें भूख नहीं है । इससे सूचित होता है कि भगवान् सच्चे पूजक के मानसी भोग से भी तृप्त हो जाते हैं ।

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