मंगलवार, 7 सितंबर 2021

*१८. साध को अंग ~ १४१/१४४*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १४१/१४४*
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आयो राली१० आलेख भजि, अतीत घर की आस ।
निस्प्रेही११ निरबान१२ लहै, सुकहि जगजीवनदास ॥१४१॥
(१०. राली=बाजरा आदि मोटा अन्न) {११. निस्प्रेही=निस्पृह(इच्छा रहित)} (१२. निरबान=संसार=दुःख से मुक्ति)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव पूर्व कर्मानुसार परमात्मा का स्मरण करता हुआ राग रहित मुक्त होकर जो जैसा मोटे धान ही हो को निस्पृह भाव ग्रहण कर मुक्ति की इच्छा करता है उसे संसार के अन्य भाव नहीं आकर्षित करते हैं ।
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साध भगति का सार१ है, साध भगति का पील२ ।
साध भगति का थंभ३ जन, जगजीवन सत सील ॥१४२॥
(१. सार=भक्तिरूप सतरंज खेल का घोड़ा) (२. पील=हाथी) {३. थंभ=स्तम्भ(प्रधान आश्रय)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि साधु ही भक्ति रुपी शतरंज के घोड़े हाथी हैं । वे ही अपने शील आचरण से भक्ति के आधार भी है ।
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भगति का प्रेरक साध है, साध भगति की जांन ।
कहि जगजीवन रांम घर, हरिगुन बचन बखांन ॥१४३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि साधुजन ही भक्ति की प्रेरणा देते हैं वे ही भक्ति की जान हैं वे ही प्रभु के इस मन्दिर में प्रभु की महिमा करते हैं ।
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जे चीन्हैं४ ते देव मुनि, सिध साधक जन रांम ।
कहि जगजीवन हरि भगति, हरि हरि सूरै नांम ॥१४४॥
(४. चीन्हैं =साक्षात्कार किया)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो देव मुनि जन प्रभु की पहचान रखते हैं वे सिद्ध साधक प्रभु जैसे ही हैं । वे प्रभु की भक्ति में सिमरण करते ही रहते हैं ।
(क्रमशः)

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