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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१००)*
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*१००. पंचम ताल*
*आव पियारे मींत हमारे, निशदिन देखूं पाँव तुम्हारे ॥टेक॥*
*सेज हमारी पीव सँवारी, दासी तुम्हारी सो धन वारी ॥१॥*
*जे तुझ पाऊँ अंग लगाऊँ, क्यों समझाऊँ वारणें जाऊँ ॥२॥*
*पंथ निहारूं बाट सँवारूं, दादू तारूं तन मन वारूं ॥३॥*
भा० दी०-हे प्रिय परमेश्वर ! मम हृदि पदार्पणं निधेहि । अहर्निशं त्वामेव प्रतीक्षे । अत्रागमने भवतां चरणस्पर्शजन्यतद्दर्शनं मेऽनायासेनैव स्यात् । दिव्यगुणालङ्कृता मम हृदयशय्याऽपि त्वदर्थमेव । त्वदीया दासी तव चरणारविन्दयोः समर्पिताऽस्ति । यदि कथञ्चिदपि तव दर्शनं जायेत तर्हि त्वदर्शनानन्देन तव स्वरूपमपि लब्धुं शक्ष्यामि । शरीरमिन्द्रियाणि मन्छेति सर्वस्वं वस्तुजातं समाह संसारात् पारं जिगमिष्यामि । अतो हे प्रभो ! दयस्व ।
उक्तं गोविन्दवैभवे ::
अये स्वामिन् समायातो व्यथातो द्वारि दीनोऽयम् ।
कृपापीयूषलेशार्थ पदाब्जे ते निलीनोऽयम् ।
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हे प्यारे मित्र ! पधारिये, मैं तो दिन-रात आपके आने की ही प्रतीक्षा कर रहा हूं । यहाँ आने से आपके चरण-कमलों का स्पर्श और दर्शन मेरे को अनायास ही हो जायेंगे । मैंने अपनी हृदय-शय्या को भी दैवी गुणों से आपके लिये ही सजा रखी है ।
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मैं आपकी दासी हूं । आपके चरण-कमलों में मैंने अपने आप को समर्पित कर दिया है । यदि किसी प्रकार थोड़ा-सा भी दर्शन मिल जाय तो दर्शन-जन्य आनन्द से आपके स्वरूप को प्राप्त ही जाऊँ । शरीर, मन, इन्द्रियाँ, ये सब वस्तुएँ आपको समर्पित कर के संसार सागर से पार जाना चाहती हूं । अतः दया करो ।
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गोविन्दवैभव में लिखा है कि – हे स्वामिन् ! यह दीन पीड़ा के कारण आपके द्वार पर आया है और कृपा-रूप अमृत के कणों के लिये चरण-कमलों में पड़ा है । अतः दया करो ।
(क्रमशः)

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