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*दादू जे कुछ कीजिये, अविगत बिन आराध ।*
*कहबा सुनबा देखबा, करबा सब अपराध ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१*
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कुकृत करि सुकृत सबै, आदि अंत मधि होय ।
जन रज्जब जग देखिये, जे करि जाणें कोय ॥५॥
इस जगत के आदि, मध्य, अंत में देखा जाता है कि - जो भी सुकृत कर जानते हैं उनसे सभी सृकृत कुकृत द्वारा ही होते हैं अर्थात बिना पाप पुण्य होते ही नहीं ।
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प्राणि हते सेवा शकति१, पंच हते शिव सेव ।
पूजे जाय न पाप बिन, रज्जब देई२ देव ॥६॥
प्राणी को मार कर बलि चढाने से शक्ति१ की सेवा होती है और पंच ज्ञानेन्द्रियों को मारने से शिव की सेवा होती है । अत: पाप बिना तो देवी२ देवता भी नहीं पूजे जा सकते ।
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इक पापी पर लै गये, इक पापी सु प्रसिद्ध ।
रज्जब समझ रु कीजिये, पाप पुण्य की विद्धि ॥७॥
एक प्रकार का पापी अर्थात प्राणियों को मारने वाला तो नष्ट हो जाता है और एक प्रकार के पापी की अर्थात पंचन्द्रियों को मारने वाले की संत रूप से प्रसिद्धि हो जाती है । अत: पाप पुण्य की विधि को समझ करके ही पाप पुण्य करना चाहिये ।
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एक कर्म कर्म ऊपजै, एक कर्म कर्म जाय ।
रज्जब कर्महि कर्म को, नर देखो निरताय१ ॥८॥
एक पाप कर्म से अनेक पाप कर्म होते हैं और एक पुण्य कर्म से पाप नष्ट हो जाते हैं इसी प्रकार एक पुण्य कर्म से अनेक पुण्य कर्म होते हैं और एक पाप कर्म से पुण्य नष्ट हो जाते हैं । अत: हे नरों ! कर्म ही कर्म को अर्थात प्रत्येक कर्म को विचार१ करके देखो और जो हित कर हो उसे ही करो ।
(क्रमशः)

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