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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.९८)*
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*अथ राग कान्हड़ा ४*
*(गायन समय रात्रि १२ से ३ बजे तक)*
*९८. विरह विनती । वर्ण भिन्नताल*
*दे दर्शन देखन तेरा, तो जिय जक पावै मेरा ॥टेक॥*
*पीव तूँ मेरी वेदन जानै, हौं कहाँ दुराऊं छानै,*
*मेरा तुम देखे मन मानै ॥१॥*
*पीव करक कलेजे मांही, सो क्योंही निकसै नांही,*
*पीव पकर हमारी बांही ॥२॥*
*पीव रोम रोम दुख सालै, इन पीरों पिंजर जालै,*
*जीव जाता क्यों ही बालै ॥३॥*
*पीव सेज अकेली मेरी, मुझ आरति मिलणै तेरी,*
*धन दादू वारी फेरी ॥४॥*
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भा० दी०-हे दयित दर्शनं देहि । यतस्त्वदर्शनदानेनैव मन: शान्ति स्थास्यति । अन्यथा भर्तृदर्शनेन विना यथा स्त्रीणां जीवनं व्यर्थं भवति । तथैव ममापि जीवनं व्यर्थमेव स्यात् । हे स्वामिन् ! किं त्वं मम व्यथां न वेत्सि । विदित्वाऽपि यदि दर्शनदानेन मम व्यथां न दूरीकरोषि तर्हि कस्त्वां
स्तोतुं प्रवर्तते । इति तवैव स्तुतिहानि: स्यात् । अहो मदीयां व्यथामहमाच्छादयितुमपि न शक्नोमि । यतस्त्वं सर्वव्यापक: सर्वज्ञोऽसि । सर्वं ज्ञात्वाऽपि यदि मम व्यथां किं त्वं न जानासि ?जानासि चेत्त्वमेव वद दर्शनाऽदाने किं कारणम् ? हे स्वामिन् मम हृदयेऽतिव्यथा प्रादुर्भवति । न सा मां विमुञ्चति । अतस्त्वमेव मां शरणीकृत्य दर्शनदानेन नि:सारय । हे स्वामिन् ! मे सर्वशरीरावयवेषु सा व्यथा व्याप्ता । किमर्थं त्वं स्वविरहाग्निना शरीरं मन्च तापयसि ? हे प्रभो ! सावधानं वा श्रूयताम् । सा हि व्यथा नान्येनोपायेन दूरीभवितुमर्हति । किन्तु त्वदर्शनेनैव सा गमिष्यति । अहो प्राणा अपि बहिर्गन्तुं त्वरन्ते, शीघ्रमागत्य तान् निरोधय । अन्यथाऽत्यल्पविलम्बेनाऽपि ते नूनं निर्गमिष्यन्ति । हे प्रभो ! त्वया विना तु ममेयं हृदयशय्याऽपि शून्येव भासते । वियोगव्यथितं मम हृदयमपि त्वदर्शनार्थमुत्कण्ठते । अन्यथा प्राणैः सह हृदयमपि मे नक्ष्यति ।
उक्तं चैतन्यशि.-
न धनं जनं न च सुन्दरी कवितां वा जगदीश कामये ।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि॥
भक्तिवेत्तर्हि दर्शनमवश्यं भविष्यतीतिभावः ॥
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मेरे प्यारे स्वामिन् ! दर्शन दो क्योंकि आपके दर्शनों से ही मेरे चित्त को शान्ति मिलती है अन्यथा जैसे पति के दर्शनों के बिना स्त्री का जीवन अच्छा नहीं माना जाता है, वैसे ही मेरा जीवन भी व्यर्थ ही हो जायगा । हे स्वामिन् ! क्या आप मेरी पीड़ा को नहीं जानते । यदि जानने पर भी मेरी व्यथा को आप दूर नहीं करते हैं तो फिर आपकी कौन स्तुति करगा ?
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यह तो आपकी ही हानि है । हाय ! मैं मेरी पीड़ा को गुप्त भी तो नहीं रख सकती हूँ क्योंकि आप सर्वव्यापक और सर्वज्ञ हैं । अतः सब जानते हैं, तो क्या मेरी व्यथा को आप नहीं जानते ? यदि जानते हो तो फिर दर्शन न देने में क्या कारण है । हे स्वामिन् ! मेरे हृदय में बहुत पीड़ा हो रही है, वह मेरे को छोड़ती भी नहीं है ।
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अतः आप हाथ पकड़कर दर्शन देकर मेरे हृदय से उस व्यथा को निकाल दो । हे स्वामिन् ! मेरे बाल-बाल में यह विरह व्यथा फैल गई है । अतः आप किसलिये मेरे शरीर और मन को विरहाग्नि में जला रहे हैं ? आप कान देकर सावधानी से सुनिये, यह पीड़ा दूसरे उपाय से दूर नहीं होगी किन्तु दर्शन देने से ही जायगी ।
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अहो ! ये मेरे प्राण भी दर्शनों के बिना शरीर से बाहर जाने की जल्दी कर रहे हैं । अतः आप जल्दी आकर इन को आश्वासन दीजिये अन्यथा थोड़ा सा भी विलम्ब हो जायगा तो निश्चित ही ये चले जायेंगे । आपके बिना यह हृदय-शय्या भी सूनी पड़ी है । वियोग से दुःखी मेरा हृदय भी आपके दर्शनों के लिये प्रेरणा कर रहा है अन्यथा प्राणों के साथ वह भी नष्ट हो जायगा ।
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चैतन्य शिक्षा में लिखा है कि –
हे जगदीश ! देखिये, मैं न धन चाहता हूं और न जन चाहता हूं और न सुन्दर कविता को बनाना चाहता हूं, किन्तु जन्मजन्मान्तरों में मैं आपकी अहैतुकी भक्ति करता रहूं, यह ही चाहता हूं, क्योंकि भक्ति होगी तो आपके दर्शन दुर्लभ नहीं होंगे ।
(क्रमशः)

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