शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

*'आगमनी'*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू चौड़े में आनन्द है, नाम धर्‍या रणजीत ।*
*साहिब अपना कर लिया, अन्तरगत की प्रीति ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ शूरातन का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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"गोविन्द राय के पास मैने अल्ला मन्त्र लिया । कोठी में प्याज डालकर भात पकाया गया । मणि मल्लिक के बगीचे में मैंने तरकारी खायी, परन्तु उससे एक तरह की घृणा हो गयी ।
"मैं देश(कामारपुकुर) गया, तब रामलाल का बाप* डरा । उसने सोचा कि यह तो इधर-उधर किसी के यहाँ भी खा लेता है । कहीं ऐसा न हो कि जाति से च्युत कर दिया जाऊँ; इसीलिए मैं अधिक दिन वहाँ न रह सका, वहाँ से चला आया । (*श्रीरामकृष्ण के बड़े भाई रामेश्वर ।)
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"वेदों और पुराणों में शुद्धाचार की बात लिखी है । वेदों और पुराणों में जिसके लिए कहा है कि यह न करो, इनसे अनाचार होता है, तन्त्रों में उसी को अच्छा कहा है ।
"मेरी कैसी कैसी अवस्थाएँ बीत गयी हैं । मुख आकाश और पाताल तक फैलाता था और तब मैं माँ कहता था, मानो माँ को पकड़े लिये आ रहा हूँ जैसे जाल डालकर जबरदस्ती मछली पकड़कर खींचना ।
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एक गाने में है – "अबकी बार, ऐ काली, तुम्हे ही मैं खा जाऊँगा । तारा, गण्डयोग में मेरा जन्म हुआ है । इस योग में पैदा होने पर बच्चा अपनी माँ को खा जाता है । अबकी बार, माँ, या तो तुम्ही मुझे खा जाओगी या मैं ही तुम्हें खाऊंगा, दो में एक तो होगा ही । मैं हाथों में, पैरों में, सर्वांग में कालिख# पोत लूँगा । जब यमराज आकर मुझे बाँधने लगेंगे तब वही कालिख उसके मुँह में लगाऊँगा । मैं यह तो कहता हूँ कि तुझे खा जाऊँगा परन्तु माँ, यह समझ ले कि खाकर भी मैं तुझे उदरस्थ न करूँगा, हृदय-पद्म में तुझे बैठा लूँगा और तब अपनी मौज से तेरी पूजा करूँगा । अगर यह कहो कि काली को खा जाओगे तो फिर काल के हाथ से कैसे बचोगे, तो कहना यह है कि मैं काली कहकर काल से पिण्ड छुड़ाऊँगा ।
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'मैं उसे अच्छी तरह जना दूँगा कि रामप्रसाद काली का बेटा है । उससे या तो मन्त्र की सिद्धि ही होगी या मेरा यह शरीर ही न रह जायगा । (#बंगला शब्द 'काली' से दो अर्थ निकलते हैं - स्याही और कालिका देवी । यहाँ उसी श्लेष से मतलब है ।)
"पागल की अवस्था हो गयी थी - यह व्याकुलता है !”
नरेन्द्र गा रहे हैं - "माँ, मुझे पागल कर दे, ज्ञान के विचार से मुझे काम नहीं ।"
गाना सुनते ही श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गये ।
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समाधि के छूटने पर पार्वती की माता का भाव अपने पर आरोपित करके श्रीरामकृष्ण 'आगमनी'(देवी के आगमन के समय का संगीत जो बंगाल में गाया जाता है) गा रहे हैं ।
गाने के बाद श्रीरामकृष्ण भक्तों से कह रहे हैं, आज महाष्टमी है न, माँ आई हुई हैं । इसीलिए इतनी उद्दिपना हो रही है ।
श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं –
"सखी री ! जिसके लिए मैं पागल हो गयी उसे अभी कहाँ पाया ?"
श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं, एकाएक 'हरिबोल' 'हरिबोल' कहकर विजय खड़े हो गये । श्रीरामकृष्ण भी भावोन्मत्त होकर विजय आदि भक्तों के साथ नृत्य करने लगे ।
(क्रमशः)

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