बुधवार, 15 सितंबर 2021

*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१(९/१२)*

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*पहली प्राण विचार कर, पीछे पग दीजे ।*
*आदि अंत गुण देख कर, दादू कुछ कीजे ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१*
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रज्जब आरंभ अध१ चढै, आरम्भ हि अध जांहिं ।
तो आरंभ आरंभ फेर२ है, समझ देखि मन मांहिं ॥९॥
एक कर्म के आरंभ से तो पाप१ चढते हैं और एक आरंभ से पाप नष्ट हो जाते हैं । इस प्रकार आरंभ आरंभ में भेद२ रहता है । अत: मन में विचार द्वारा देख करके ही कार्य आरंभ करना चाहिये ।
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कुकृत बेड़ी लोह की, सुकृत छीणी तास ।
एक कृत्य कर्म उदय ह्वै, एक कृत्य कर्म नाश ॥१०॥
कुकर्म लोहे की बेड़ी है और पुण्य कर्म उसे काटने वाली छीणी है । अत: एक कार्य से तो कर्म उत्पन्न होता है और एक से नाश हो जाता है, जैसे एक क्रिया बेड़ी बनी थी और दूसरी क्रिया से कट गई ।
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आरम्भ सब ही निर्दयी, तिनकरि सुकृत होय ।
यूं चलतो सीझै सबै, काज न विनश्या कोय ॥११॥
कार्यारंभ तो सभी दयाहीन होते हैं अर्थात सभी में कुछ न कुछ हिंसा होती है किंतु उन कार्यारंभों से ही पुण्य होता है । इस प्रकार पुण्य करने वालों के सभी कार्य सिद्ध हुये हैं, कोई भी कार्य नष्ट नहीं हुआ वा इस प्रकार चलने से सिद्धावस्था रूप मुक्ति को प्राप्त हुये हैं, किसी का भी मुक्ति रूप काम नष्ट नहीं हुआ है ।
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खच्चर बीछणी केलि गर्भ, पाप पुण्य परकाश१ ।
रज्जब निपजै चतुर फल, मूल माहात्म्य नाश ॥१२॥
खच्चरी और बीछनि के गर्भ मां के पेट को फाड़कर निकलते हैं जिससे खच्चरी और बीछनी मर जाती है । केले के फल आजाने पर केले को काट देते हैं । पुण्य कार्यारंभ से जो पाप प्रकट होता है वह उसी कर्म के पुण्य से नष्ट हो जाता है । 
इस प्रकार उक्त - खच्चर, बीछू, फल और पुण्य, इन चार फलों के उत्पन्न होने पर इनके मूल कारणों को महत्व नष्ट हो जाता है ।
(क्रमशः)

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