बुधवार, 8 सितंबर 2021

*नापित जाति रु संतन सेवै*

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*साहिब सौं सन्मुख रहै, सत संगति में आइ ।*
*दादू साधू सब कहैं, सो निष्फल क्यों जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*सेन की पद्य टीका*
*सेन भगत्त सु बाँधु रहै गढ़,*
*नापित जाति रु संतन सेवै ।*
*नेम हि साधि चल्यो नृप न्हावन,*
*आवन साधु फिर्यो मन देवै ॥*
*सेव करै जन नांहिं डरै हरि,*
*भूप नहावत पाय न भेवै१ ।*
*सेन चल्यो फिरि जाय मिल्यो नृप,*
*जान अचंभ कहा यह टेवै ॥१६७॥*
सेन भक्त बघेल खंड के बांधवगढ़ में रहते थे । आप जाति के नाई थे । संतों की सेवा किया करते थे । (राजा ने बाँधवगढ़ को छोड़कर पीछे रीवां बसाया है)
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एक दिन सेनजी अपने भजनादि नियम को पूर्ण करके, राजा को स्नान कराने चले थे कि मार्ग में संत आते हुये मिल गये, तब संतों की सेवा करने के लिये सेन जी लौट आये और पूर्ण रूप से मन लगाकर संतों की सेवा करने लगे ।
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इस समय भक्त को राजा का डर नहीं लग रहा था । कारण - उधर भगवान् सेन का रूप धारण करके राजा को स्नान करा रहे थे । किन्तु इस रहस्य१ को राजा आदि तथा सेन कोई भी नहीं जान रहे थे कि राजा को भगवान् ही स्नान करा रहे हैं ।
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फिर सेन संत सेवा से निवृत्त होकर घर से चला और राजा से मिला । राजा ने सेन को लौट के आया जानकर आश्चर्य पूर्वक कहा - तेरा यह क्या स्वभाव२ है लौटकर क्यों आया है ?
(क्रमशः)

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