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*सब जीव प्राणी भूत हैं, साधु मिलैं तब देव ।*
*ब्रह्म मिलै तब ब्रह्म हैं, दादू अलख अभेव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पारिख का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*अग्रदासजी की पद्य टीका*
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*इन्दव -*
*भूपति मान दरस्सन आवत,*
*बाग छयो दर है सु सिपाही ।*
*पात बुहारि गये जन डारन,*
*भीर हि देख रु बैसि रहा ही ॥*
*नाभ हि आय प्रणाम करी,*
*जल नैन भरे सु प्रवाह बहाही ।*
*देख रह्यो नृप हारि गयो ढिग,*
*खीजत चाकर आप कहा ही ॥१७६॥*
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एक समय अग्रदासजी के दर्शन करने आँमेर नरेश मानसिंह आये थे । उस समय आप बाग की सेवा में थे । इससे राजा अपने समाज के सहित बाग के द्वार पर ही चले गये और द्वार पर द्वारपाल बैठा दिये गये जिससे दूसरे लोग बाग में घुसकर भीड़ नहीं कर सकें ।
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अग्रदासजी उस समय बाग के पत्ते बुहार कर बाहर डालने के लिए बाग से बाहर निकल चुके थे । कूड़ा फैंककर देखा तो द्वार पर राज सेवकों की भीड़ हो रही है और द्वार रक्षक भी द्वार पर हैं ।
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तब आप एक आम्र वृक्ष के नीचे बैठकर प्रभु का ध्यान करने लगे । देर होते देखकर नाभाजी आये और साष्टांग दण्डवत करके सन्मुख खड़े हो गये । आपकी निरभिमानता, सरलता और प्रम-मग्नता देखकर प्रेम से विह्वल हो गये और उनके नेत्र जल से भरकर धारा प्रवाह बहने लगे ।
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उधर राजा आपकी प्रतीक्षा करते करते थक गया । फिर स्वयं ही वहां आकर दोनों सन्तों की विलक्षण भगवत् प्रीति अपने नेत्रों से देखकर कृतकृत्य हो गया और बोला - बाग की सेवा तो सेवक ही कर लेंगे । तब आपने कुछ नाराज होकर कहा - हम भी तो भगवान् के सेवक ही हैं ।
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आपकी आचार्य गादी रेवासा है, जो जयपुर के प्रान्त शेखावाटी स्टेशन गोरयाँ के पास है । आप वहां ही रहे हैं । गलता में कीलदेव जी रहे हैं । आपका जन्म फाल्गुन शुक्ला द्वितीया को हुआ था । आपके ध्यानमञ्जरी, कुण्डलियाँ और पदावली आदि ग्रंथ हैं ।
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अग्रदासजी के अन्य चरित्र - एक समय आप सन्त समाज के सहित तीर्थयात्रा गये थे । मार्ग में एक वैश्य का बाग आया, एक रात्रि के लिए आप उसमें ठहर गये । वैश्य ने सुना तब आकर भोजनादि सभी प्रकार सन्तों की सेवा की । रात्रि होने पर वैश्य को अग्रदासजी ने कहा – अब घर जाओ ।
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उसी रात को उसके पुत्र को सर्प ने काट लिया, वह मर गया । उसके घर जाकर अग्रदासजी ने सन्तों की चरण-रज धोकर उसे पिलाई, उससे वह पुनः जीवित हो गया । तब वहां के राजा आदि अग्रदास जी के शिष्य होकर भगवद् भक्त बन गये ।
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एक समय अग्रदासजी और कीलदास जी दोनों स्नान करके स्थान को आ रहे थे । वहां मार्ग में इनने एक अंधा बालक देखा । वह गाने का काम करने वाली डोम जाति का था । भयंकर काल पड़ने से उसकी माता उसको छोड़कर अन्न के लिये चली गई थी । उससे अग्रदासजी ने पूछा - तू कौन है ? अकेला मार्ग में क्यों बैठा है ? वह बोला - मेरी माता भूख से व्यथित होकर कहीं चली गई है । अग्रदासजी ने कहा - तेरी माता को धिक्कार है, जो तुझे छोड़कर चली गई ।
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बालक ने कहा - भगवन् ! माता को क्या दोष है ? आप भी साधारण जन के समान छोड़ रहे हैं । सांसारिक लोग तो स्वार्थ के होते ही हैं । देखिये जिसका पुत्र ब्रह्मा है, पिता समुद्र है, बहिन लक्ष्मी है, विष्णु बहनोई है, उस कमल को भी बरफ़ नष्ट कर देता है । यह सुनकर कीलजी संत ने अपने कमंडलु का जल उसके नेत्रों पर मारा । उससे उसके नेत्र ठीक हो गये । तब बालक उनके चरणों में पड़कर रोने लगा ।
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संतों को दया आ गई, बालक को अपने आश्रम गलता पर ले आये और उसे शिक्षा दी - संतों का चरण जल पान किया कर तथा संतों का उच्छिष्ट भोजन किया कर । साढ़े तीन कोटि तीर्थ जगत में हैं, वे सब संतों के चरणों में हैं । उक्त भोजन-पान से बालक के हृदय में ज्ञान, वैराग्यादि प्रकट हो गये । अग्रदासजी ने मंत्र दीक्षा देकर नारायणदास नाम प्रदान किया ।
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एक समय अग्रदासजी मानसी पूजा कर रहे थे । नारायणदास उनको पंखा कर रहे थे । उसी समय अग्रदासजी का एक शिष्य समुद्र में एक जहाज में था । जहाज रुक कर डूबने की स्थिति में आने वाला था । उस शिष्य ने विपत्ति के समय गुरुजी का ध्यान किया । तब अग्रदासजी के ध्यान में वह जहाज डूबने की बात आ गई । इससे भगवद् ध्यान छूट गया । यह स्थिति नारायणदासजी को ज्ञात हो गई । तब उनने भगवान् से प्रार्थना की - प्रभो जहाज उबारिये गुरुजी को विक्षेप हो रहा है ।
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प्रार्थना करते ही भगवान् ने जहाज को विपत्ति से मुक्त कर दिया, वह चल पड़ा । तब नारायणदासजी ने कहा - गुरु देव ! वह जहाज विपत्ति से मुक्त होकर दूर चला गया है । आप उसकी चिन्ता छोड़कर अपने मन को भगवद् ध्यान में लगाइये । यह सुनकर अग्रदासजी ने नेत्र खोलकर नारायणदास की ओर देखकर पूछा - 'कौन बोला' - नारायणदासजी ने कहा - आपका शरणागत बालक ही बोला था ।
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यह सुनकर अग्रदासजी ने कहा - मेरी नाभि की बात भी तू जान गया है, अतः आगे तेरा नाम नाभा प्रसिद्ध होगा । अब तू भक्तमाल की रचना कर । मेरे मन की बात के समान ही भगवत् कृपा से तुझे भक्तों के चरित्र भी ज्ञात हो जायेंगे । नाभाजी ने भक्तमाल वि० सं० १६४० और १६८० के बीच में लिखी थी । अग्रदासजी विक्रमीय संवत् की सत्रहवीं शताब्दी में विराजते थे ।
(क्रमशः)

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