रविवार, 10 अक्टूबर 2021

*१९. मधि कौ अंग ~ २५/२८*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१९. मधि कौ अंग ~ २५/२८*
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हिन्दू कहै तो हद७ मैं, तुरक कहै तो तांम ।
कहि जगजीवन रांम हि जांणै, सोइ सुखी सब ठांम ॥२५॥
(७. हद=वेद की सीमा)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हिन्दू गहन ज्ञान प्रदर्शन हेतू वेद की बात कहते हैं मुसलमान उसका निरुपण राम में कर देते हैं, संत कहते हैं कि जो प्रभु को भलिभाँति जानते हैं वे ही सब स्थानों पर सुखी हैं ।
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जाति कहै तो जीव महिं, न कहै तो नहिं नांम ।
कहि जगजीवन सांच कहि, रांम सुणै सब ठांम ॥२६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जाति की बात करें तो यह जीवों में है । और न ही बात करें तो इसका नाम भी नहीं है । सत्य तो यह है कि प्रभु हर स्थान पर सबकी सुनते हैं ।
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रांम भगति बिन धंध१ सब, तुंगी२ अरि प्रकास ।
हरी भजै घरनिरत३ रहैं, जगजीवन ते दास ॥२७॥
(१. धंध=भ्रम) (२. तुंगी=रात्रि) (३. घरनिरत=गृहस्थ के धंधे में लगा हुआ भी)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम की भक्ति के बिना सब अंधकार व प्रकाश व्यर्थ है जो अपने स्थान पर रह कर निरंतर परमात्मा का भजन करें वे ही सच्चे भक्त हैं ।
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कहि जगजीवन रांमजी, मुठि एक असत अगाध ।
गंग जमुन के मधि४ हरि, सतगुरु राखौ साध ॥२८॥
(४. गंग जमुन के मधि=इडा, पिंगला नाड़ी के मध्य)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु एक साथ जिसमें असत होवह भी अपरिमित तो उसका उद्धार कैसे होगा । देह मध्य ईड़ा पिंगला नाड़ी मध्य कुंडलिनी है वह गुरु कृपा से जागृत होने पर हरि जी का दर्शन हो जाता है ।
(क्रमशः)

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