शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

*१९. मधि कौ अंग ~ २१/२४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*१९. मधि कौ अंग ~ २१/२४*
.
रोयां रहै न हंस्यां रहै, रहै न आंन उपाइ ।
कहि जगजीवन प्रीति हरि, रांम रहै रस पाइ ॥२१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु न तो रोने से रहते हैं ना हंसने से न अन्य किसी उपाय से वे तो परमात्मा में प्रीत से व राम नाम स्मरण के आनंद रस से ही रहते हैं ।
.
कहि जगजीवन जहँ चलौ, तहँ तहँ धरणि अकास ।
ताथैं मधि घरि मन थक्या, निज हर निकट निवास ॥२२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ तक धरती आकाश दिखते हैं वहाँ तक तो दृश्यों के साथ मन चलता है । फिर उसके मध्य परमात्मा का घर है जहां पहुंच मन थक जाता है ।
.
हम कछु नांहीं का कहँ, है सोइ अल्लह एक ।
कहि जगजीवन जाति कुल, घटि घटि नांम अनेक५ ॥२३॥
(५. घटि घटि नांम अनेक=प्रत्येक शरीर के भिन्न नाम हैं)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हम कुछ भी नहीं है जो है वो सब अल्लाह है संत कहते हैं कि जाति व कुल के अनुसार हमनें उस प्रभु के अनेक नाम रख लिये हैं ।
.
कहि जगजीवन खाख६ के, नांम धरै कै लाख ।
आदि सोई मद्धि पिछांणै, अंत खाख की खाख ॥२४॥
{६. खाख=भस्म(राख)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हमने इस मिट्टी से शरीर के अनेक नाम रख लिये हैं जिनकी संख्या लाखों में है । यह जो आरम्भ है वही मध्य में है और अंत भी पुनः यही है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें