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*ता माली की अकथ कहानी, कहत कही नहिं आवै ।*
*अगम अगोचर करत अनन्दा, दादू ये जस गावै ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ३७०)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*पयहारी कृष्णदासजी के अन्य शिष्य –*
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*१. केवलदासजी -* आप तीर्थयात्रा करने जा रहे थे । मार्ग में एक किसान ने एक बैल के जोर से दंडा मारा । उसे देख, केवलदासजी पछाड़ खाकर पृथ्वी पर पड़ गये । यह देख सब लोग दौड़ कर आये और पूछा - किसने मारा ? केवलदासजी ने कहा - किसान ने बैल के मारी थी सो मेरे लगी है ।
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सबने पीठ देखी तो दंडे का चिन्ह पीठ पर है । बैल के शरीर पर तो कुछ भी पीड़ा नहीं हुई, दयालु संत ने ओट ली । इससे किसान भयभीत होकर केवलदासजी के चरणों में पड़ गया । उनने उसे अभय दान दिया और हृदय में दया रखते हुये भगवद् भजन करने का उपदेश दिया ।
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*२. चरणदासजी -* आप हरि के अनन्य भक्त थे, संतों में भेद भाव नहीं रखते थे । संतों को जिमाकर आप जीमते थे । एक दिन मार्ग में एक पंगु संत पैर घसीटते हुये जा रहे थे । उन्हें देखकर आप दौड़े और उनको अपने आश्रम में ले आये । उनकी पूजा करके बड़े प्रसन्न हुये । फिर ज्योंही आपने उनके चरण स्पर्श किये त्योंही उनके पैर ठीक हो गये । वे अच्छी प्रकार चलने लगे, फिर तीर्थ यात्रा को चले गये । इससे चरणदास जी का सुयश फैल गया । आप जन्मभर संतों की सेवाकर के अंत समय पार्षदों के साथ भगवद् धाम को पधारे ।
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*३. व्रतहठीदासजी -* की कथा आनन्द की धाम है । जिनके मुख से सदा प्रत्येक शब्द के प्रथम राम का नाम ही निकलता था । भोजन, पान, शयन, बैठते, चलते यादि सभी क्रियाओं के साथ शब्द बोलते तब प्रथम राम शब्द बोल कर ही बोलते थे । यह व्रत ही उनका हठ था । उनको एक राम का ही विश्वास था । अन्य की आशा नहीं करते थे । एक समय विचरते समय अकेले ही रह गये थे ।
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प्यास लगी बड़ा दुःख हुया, कारण - जब कोई वस्तु लेते थे तब भी देने वाला राम बोल के दे तो ही लेते थे । वन में कोई था नहीं । तब राम ही ब्राह्मण का रूप बनाकर प्रकट हुये । उनको देखकर हठीजी ने राम का नाम बोला । तब ब्राह्मण ने भी राम नाम बोला । फिर हठीदासजी ने जल पान किया पीछे । ब्राह्मण अन्तर्धान हो गया । हठीजी ने जैसे कष्ट पड़ने पर भी अपना नियम नहीं तोड़ा वैसे ही यदि कोई नियम से नाम कहे और कहलाये तो उनके ही समान भगवद् दर्शन और गति हो सकती है । इसमें क्या संशय है ?
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*४. नारायणदासजी -* संतों से अति प्रीति करते थे और पूर्ण विश्वास के साथ संतों के चरणों की रज को शिर पर धारण करते थे । आपकी ध्यानमय भावना भी बाहर प्रत्यक्ष देखी गयी थी । एक समय आप बदरी नारायण की यात्रा करने गये थे । वन में एक झूला आया । उस पर यात्रियों की बहुत भीड़ थी । पार जाने का अवसर नहीं मिल रहा था । तब आप इधर ही बैठकर ध्यान द्वारा पार जाने की भावना करने लगे ।
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दो घड़ी के पश्चात् जब आपने नेत्र खोले तो अपने को झूला से पार ही पाया । यह देख कर यात्रीगण ने आपको बारंबार प्रणाम किया । फिर आप बदरी नारायण जा पहुँचे । वहां नर नारायण के दर्शन किये और वहां ही योग साधना करने लगे । कुछ समय के पश्चात् रामायण पढते पढते ही शरीर त्याग कर नारायणदास जी नारायण में ही लीन हो गये ।
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५. सूरजदासजी - रामजी के अनन्य भक्त थे । आप सूर्य मंडल में सुखराशि राम जी का ध्यान करते थे । सूर्य मंडल का दर्शन किये बिना अन्न जल नहीं ग्रहण करते थे । इस प्रकार नियम का निर्वाह करते हुये बहुत समय व्यतीत हो गया था । एक दिन भादों मास में बादलों ने आकाश को घेर लिया था, वर्षा भी अच्छी हुई थी, किन्तु सूर्य मंडल नहीं दिखाई दे रहा था । तब जमात के संतों को देखकर, सोचा आज मैं भोजन कैसे करूंगा ? और मेरे नहीं करने से संभव है कुछ अन्य संत भी नहीं करें ।
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पीछे आप उठे और शीघ्र पूजन करने लगे । तब उनका नियम जानकर भगवान् ने घनमंडल को तोड़ कर शीघ्र ही सूर्य को प्रकट रूप से दिखाया था । तब सूर्य का दर्शन करके सूरजदासजी ने भोजन किया । यह देखकर सब संतों ने आश्चर्य माना और सूरजदासजी को प्रणाम किया । सूरजदासजी ने उक्त नियम आजन्म निभाया ।
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पयहारीजी के षोडश(१. पद्मनाभ, २. गोपालदास, ३. पुरुषोत्तमदास, ४. पृथु दास, ५. त्रिपुरदास, ६. टीलादास, ७. हेमदास, ८. कल्याणदास, ९. देवापांडा, १०. गंगादास, ११. गदाधरदास, १२. विष्णुदास, १३. चांदनदास, १४. रंगदास, १५. कान्हरदास १६. टेक राम)
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*शिष्यों की मिश्रित कथा -* पयहारी कृष्णदासजी के उक्त सोलह शिष्य भगवान् के अनन्य भक्त थे और पयहारीजी की आज्ञा में थे । एक समय बदरी नारायण की यात्रा करके आते समय मार्ग चलने से बहुत थक गये थे । एक ग्राम के पास एक ही बड़ का वृक्ष था, अन्य वृक्ष नहीं थे । वट के नीचे पास ही एक कूप था । संतों ने उस वट के नीचे ही रात्रि को निवास किया ।
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उस वट में रात्रि को बहुत से प्रेत अपनी नारियों के सहित रहते थे । वट के नीचे रेत बहुत थी । आधी रात को बहुत जोर से आंधी आई । उससे संतों के शरीर से स्पर्श हुई रेत उड़कर वट में स्थित प्रेतों के शरीर पर छा गई । संत चरण रज का प्रभाव तो प्रकट है ही । उससे प्रेत अपनी योनि से छुटकर विमान द्वारा उत्तम लोक को चले गये । बिना श्रद्धा भी संत चरण रज से प्रेतों की प्रेत योनि छुटगई, फिर जो श्रद्धा से संत चरण रज शिर पर धारण करे उस के कल्याण में तो संशय ही क्या है ?
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*दूसरी कथा -* एक समय षोडश संत ही संभर के मेले में गये थे । बीच में एक गहरी धार वाली नदी आ गई । केवट पैँसे लेकर उससे पार करते थे । पार जाने की इच्छा से पोडश संत भी नाव पर बैठ गये और भी बहुत मनुष्य बैठे थे । जब नवका अति गंभीर मध्य धार में आई तब केवट ने पैसे माँगे । षोडश के पास पैसे नहीं थे ।
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जब षोडश से पैसे नहीं मिले तब केवट ने कहा - मैं नवका लौटाकर पीछा तट पर छोड़ आऊंगा । बिना पैसे दिये तुम को पार नहीं करूंगा । संतों ने कहा - लौटने से तो तेरे को अति श्रम होगा । तुम हमको यहां ही उतार दो । ऐसा कहकर सोलह सन्त उस नदी के मध्य की गम्भीर धार में कूद पड़े । उनके कूदते ही, वहां जल के स्थान में स्थल हो गया । नवका भी रुक गई । पानी बिना कैसे चले ।
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यह आश्चर्य देखकर केवट सन्तों के चरणों में पड़कर बोला - आप नाव पर बैठें, मैं आपको पार करूंगा । जब सन्त चढे तो पुनः गम्भीर जल वहां हो गया । सन्तों का जय जयकार हुआ । वहां के राजा ने यह सुना तब वह आया और सन्तों को घर ले जाकर उनका अति सत्कार किया ।
(क्रमशः)

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