🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*१९. मधि कौ अंग ~ २९/३२*
.
कहि जगजीवन रांमजी, मन मन मांही बंधी ।
हरष५ हंस क्रीळा करै, गंग जमुन की संधि ॥२९॥
{५. हरष=हर्ष(=प्रसन्नता)पूर्वक}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि है प्रभु सबके मन में ग्रंथि बंधी है । किंतु जीव रुपी हंस तो ईड़ा पिंगला नाड़ी मध्य कुंडलिनी में ही रहता है ।
.
कहि जगजीवन रांमजी, दोइ पख दोइ रह६ मधि ।
अलह अलख अगाध हरि, नांउ निरंजन सिधि ॥३०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि ईश्वर व अल्लाह दोनों ही हमारी देह में है । अल्लाह दिखते नहीं हरि अपरिमित है अतः दोनोँ को स्मरण से पा सकते हैं ।
.
इत* ऊँकार ज्यूं उत अलिफ, उतपति बेद कुरांन ।
कहि जगजीवन कही कहै, अकह कहै सोइ जांन* ॥३१॥
(*=*. इत ॐ कार ज्यूँ=ॐ अक्षर से वेद की उत्पत्ति मानी जाती है, तथा अलिफ़ अक्षर से कुरान की । ये दोनों ही धर्मग्रन्थ कोई नयी बात नहीं कहते, केवल पूर्वकथित बातों को ही दुहराते हैं । कुछ अपूर्व कहा जाता तो विचारणीय भी होता ! ॥३१॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जैसे यहां ओंकार से व मुस्लिम वर्ग में अलिफ शब्द से क्रमशः वेद व कुरान की उत्पत्ति हुई । ये ग्रंथ भी वही बात कहते हैं कोइ एक दूसरे से भिन्न नहीं है नयी नहीं है । इनमें भी कुछ नया या अपूर्व कहा जाता तो कुछ बात होती ।
.
कहि जगजीवन पाक दिल, रोजा रोज खुदाइ ।
एक दसा एकादसी, हरि भजि हरि गुण गाइ ॥३२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पवित्र मन का रोज ही रोजा कबूल होता है । और हरिगुणगान करनेवाले को बिना एकादशी किये ही एकादशी का लाभ मिलता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें