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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१९. मधि कौ अंग ~ ३३/३६*
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कहि जगजीवन कर ग्रही, माला तसबी जोइ ।
राजी खुसी बाजी भ्रमै, भ्रमै एक थै दोइ ॥३३॥
संतजगजीवन जी कहते है कि माला या तसबीह जो भी हाथ में हो । सब आनंद के स्त्रोत होने चाहिए नहीं तो द्वैत के कारण पूरा जीवन ही भ्रम में निकल जाता है ।
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अलिफ़ इलम अल्लह लख्या, काया करी किताब ।
कहि जगजीवन कर ग्रही, काजी समिझ सिताब७ ॥३४॥
(७. सिताब=तत्काल)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अलफ के अनुभव से अल्लाह दिखा या जाना और इस देह रुपी पुस्तक को पढा । जो हाथ में था उसे देखकर धर्म गुरु तत्काल समझ गये कि हमारी साधना कैसी है ।
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अगनि* गौर अंबु दाग तजि, विरह अगनि तन दागि ।
कहि जगजीवन नूर मांहि, नूर निरख मिलि जागि* ॥३५॥
{*=*. अगनि गौर अंबु=लोक में इस शरीर की चतुर्विधि दाह= क्रिया प्रचलित है=१. अग्निदाह (हिन्दुओं में); २. कब्र में दबा(गाड) देना(मुसलामानों में); ३. सन्यासियों को या छोटे बच्चों को जल में प्रवाहित करते हैं, परन्तु ४. कुछ सन्त जन अपने शरीर को विरहअग्नि से ही भस्म कर देते हैं । हम तो इनमें सर्वोत्तम दाहक्रिया उसे मानते हैं जो अन्त समय में अपने शरीर को परम तत्त्व के प्रकाश(नूर) में मिला देते हैं; जैसा कि श्रीदादूदयालजी महाराज के विषय में प्रसिद्ध है । कुछ सन्त पवनदाह भी मानते हैं ॥३५॥}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस शरीर की चार भांति दाह क्रिया कही गयी है । जैसे अग्नि, मिट्टी, जल व विरह । किन्तु सर्वोत्तम वह जो शरीर को परम तत्व के प्रकाश में मिला दे जैसा की दादू जी महाराज का हुआ । कुछ संत पवन दाह भी मानते हैं ।
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हिन्दू देखत देहुरे, मुसलमान मसीति ।
कहि जगजीवन हरि भगति, मद्धि रहै मन जीति ॥३६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हिंदू मंदिर मुसलमान मस्जिद में जाना भक्ति मानते हैं किन्तु वास्तविक हरि भक्ति तो मन जीत कर प्रभु में मगन रहे जो मध्यममार्गी *है* को ही मानते हैं ।
(क्रमशः)

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