मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021

*कील करणजी के शिष्य*

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*सतगुरु काढे केस गहि, डूबत इहि संसार ।*
*दादू नाव चढाइ करि, कीये पैली पार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*कील करणजी के शिष्य*
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*मूल छप्पय -*
*मन वच कर्म धर्म धारि उर,*
*राघव उधरे राम कहि ॥*
*दिप्यो१ दमोदर दास, तिलक२ गुरु को लहि पाछैं ।*
*चतुरदास भगवान, रूप मत गह्यो सु आछैं ॥*
*लाखा छोतर देवकर्ण, देवा सु सुघड़ अति ।*
*खेम रायमल गौड़, करी गृह भक्ति-भाव मति ॥*
*अद्भत रायमल नीपजे,*
*गुरु कीलकरण की शरण गहि ।*
*मन वच कर्म धर्म धारि उर,*
*राघव उधरे राम कहि ॥१८४॥*
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मन, वचन और कर्म से हृदय में धर्म को धारण करके तथा राम का भजन करके कीलकरण जी के ये दश शिष्य संसार से पार हो गये हैं -
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१. दामोदरदास जी कीलकरणजी के पश्चात् उनकी गद्दी२ को प्राप्त करके विशेष रूप से सुशोभित१ हुए थे,
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२. चतुरदासजी, ३. भगवान् दासजी, ४. रूपदासजी ने अपने गुरुदेव का सुन्दर सिद्धान्त भली प्रकार से ग्रहण किया था,
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५. लाखाजी, ६. छीतरदासजी, ७. देवकर्णजी, ८. देवादासजी जो सुन्दर स्वभाव के तथा अति चतुर थे,
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९. खेमदासजी, १०. रायमलजी गौड़ ने गुरु प्रदत्त बुद्धि द्वारा अर्थात् ज्ञान द्वारा घर में रह करके ही प्रेमपूर्वक भगवद् भक्ति करी थी ।
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गुरु कीलकरणजी की शरण ग्रहण करके रायमलजी अद्भुत भक्त हो गये हैं ।
(क्रमशः)

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