बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

*अग्रदासजी के शिष्य*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
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*दादू पूरणहारा पूरसी, जो चित रहसी ठाम ।*
*अन्तर तैं हरि उमग सी, सकल निरंतर राम ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*अग्रदासजी के शिष्य*
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*मूल छप्पय -*
*जन के कारज करत हैं,*
*अनवाँछित हरि आय ॥*
*नाभा जंगी प्राग, विनोदी पूरण पूरे ।*
*बनवारी भगवान, दिवाकर नांहीं दूरे ॥*
*नृसिंह खेम किशोर, लघु ऊधौ जगनाथ ही ।*
*ये तेरह शिष अग्र के, सीझे गुरु के साथ ही ॥*
*जन राघव रुचि प्रीति पन,*
*जे मन सधत सुभाय ।*
*जन के कारज करत हैं,*
*अनवाँछित हरि आय ॥१८५॥*
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अग्रदासजी के शिष्य १. नाभा(नारायणदास), २. जंगीदास, ३. प्रयागदास, ४. विनोदीराम, ५. पूरणदास, जो गुरु तथा हरि भक्ति करने में पूरे थे…
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६. बनवारीदास, ७. भगवान्दास, ८. दिवाकरजी, जो गुरु से दूर नहीं रहे थे वा छिपे हुये नहीं हैं, प्रकट हैं
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९. नृसिंहदास, १०. खेमदास, ११. किशोरदास, १२. उद्धवदास, जो सदा नम्रता से युक्त रहते थे वा सब से छोटे थे, १३. जगन्नाथजी
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ये तेरह शिष्य अग्रदासजी के हुये हैं और अपने गुरुदेव अग्रदासजी के सत्संग से भगवत् प्राप्तिरूप सिद्धावस्था को प्राप्त हुये हैं ।
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यदि भक्त का मन भक्त के सुन्दर, भाव, श्रद्धा, प्रीति, भजनादि की प्रतिज्ञा से सध जाता है अर्थात् भगवत् परायण हो जाता है तो भक्त का कार्य बिना इच्छा किये भी भगवान् आकर जाते हैं ।
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जैसे अग्रदासजी के भक्त का जहाज तार दिया था । जहाज तारने की कथा अग्रदासजी की कथा में आ गई है ।
(क्रमशः)

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