बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

*१९. मधि कौ अंग ~ ३७/४०*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१९. मधि कौ अंग ~ ३७/४०*
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अनुआसिका१ आदि हरि, अंत अवस्था नांम ।
कहि जगजीवन मद्धि घर, नैंन निरख रटि रांम ॥३७॥
{अनुआसिका=अन्वासिका=साधना(=भगवदाराधना) में भगवान् का प्रथम स्थान है । नाम जप का अन्तिम एवं साधक के आवास का स्थान मध्य में होता है}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मध्यम मार्ग में आंखों से स्वरूप दर्शन व स्मरण है अतः साधक को श्वास श्वास में स्मरण कर प्रथम स्थान प्रभु को व नाम जप का अंतिम आवास मध्यम मार्ग में ही हो ।
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रांम अलेख अपार हरि, रांम परम पद पाइ ।
कहि जगजीवन रांम रटि, यों जन रांम समाइ ॥३८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम अपार है वे लेख से फिरे हैं । स्मरण से ही जीव परमपद पा सकते हैं ।
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पच्छिम अलह निवाज करि, पूरब दंडवत रांम ।
कहि जगजीवन बंदगी, अगम ठांम हरि नांम ॥३९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पश्चिम में मुस्लिम नमाज पढते हैं पूर्व में हिंदू प्रभु पूजा कर दण्डवत करते हैं । संत कहते हैं उस परमात्मा की पूजा बंदगी तो उन अगम हरि का स्मरण ही है ।
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रोजा* निवाज ग्यारस डंडव्रत, हिन्दू मुसलमांन ।
कहि जगजीवन हरि भगति, रांम रटै गुर ग्यांन ॥४०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि रोजा नमाज एकादशी ये जो हिंदू मुसलमान करते हैं इनमें सबसे श्रेष्ठ हरि भक्ति व रामगुणानुवाद व गुरु ज्ञान को जीवन में उतारना है ।
(क्रमशः)

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