रविवार, 17 अक्टूबर 2021

*संत स्वभाव सर्वंगी शिरोमणि*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
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*साधु शब्द सुख वर्षहि, शीतल होइ शरीर ।*
*दादू अन्तर आत्मा, पीवे हरि जल नीर ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*मू.इ. -*
*पर की प्रभुता करे आप अमानक,*
*ऐसो भयो दिव्य देव दिवाकर ।*
*संत स्वभाव सर्वंगी शिरोमणि,*
*मानो मिली दुरि दूध में शाकर ॥*
*जीवित मुक्त दिपै दश हूं दिशि,*
*ज्यूं नव-खंड उद्योत प्रभाकर ।*
*राघो कहै परमारथ से रुचि,*
*स्वारथ के शिर दे गयो टाकर ॥१८९॥*
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दिवाकर जी ऐसे दिव्य देवता पुरुष हुये कि अन्य के महत्व का तो सम्मान करते थे किन्तु आप निर्मान रहते थे । आप संतों के समान स्वभाव वाले थे, सभी को अपना मानकर स्वीकार करते थे । दोष दृष्टि से रहित थे ।
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इसीलिये वे सर्वशिरोमणि होकर सबमें ऐसे मिले रहते थे जैसे दूध में मिलकर शक्कर अदृश्य हो जाती है और दूध को मधुर बनाये रखती है । ये सबमें मधुर होकर अर्थात् सर्वप्रिय होकर रहते थे, अपना भिन्नत्व कुछ भी नहीं दिखाते थे ।
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जैसे जम्बू द्वीप के नव-खंडों में सूर्य प्रकाशित होते हैं वैसे ही वे जीवन्मुक्त होकर दशों दिशाओं में प्रकाशित होते थे ।
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उनकी परमार्थ में प्रीति थी । वे स्वार्थ के शिर पर ठोकर मारकर परब्रह्म के स्वरूप में प्रवेश कर गये हैं ।
(क्रमशः)

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