🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*१९. मधि कौ अंग ~ ५३/५६*
.
कहि जगजीवन रोइ हंसि, बोलै हरि के साथ ।
हरिष सोक की उपजनि, मिलै न हरि के साथ ॥५३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि रोकर या हंसकर जैसा भी हो सब प्रभु समर्पित हो प्रभु के सानिध्य में सुख दुख की अनुमभूति नहीं होती है ।
.
जीव विहूंणां१ जीव है, ह्रिददा बिहूंणा हेत२ ।
कहि जगजीवन पतंग रंग, ज्यूं जल धोया सेत३ ॥५४॥
{१. विहूंणां=विहीन(रहित)} (२. हेत=प्रीति) {३. सेत=श्वेत(=सफेद)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहां जीव या दया के बिना जीव है जहाँ ह्रदय या द्रविता के बिना स्नेह हो वह सब उस पतंग जैसा है जो पानी से धुलते ही सफेद हो जाती है ।
.
अस्त४ तुचा५ हरि मस्ति६ करि, परम पुरिष वर नारि ।
कहि जगजीवन आदि घरि, अंबु उदिक जस वारि७ ॥५५॥
{४. अस्त=अस्थि(=हड्डी)} {५. तुचा=त्वक्(=चर्म)} (६. मस्ति=समर्पित कर) (७. अंबु, उदक, वारि=जल)
संतजगजीवन जी कहते है कि अस्थि, त्वचा व मस्तक सब परमात्मा को समर्पित करें है आत्मा रुपी नारी तुम उस परम पुरुष परमात्मा का वरण करें ।
.
हिन्दू तुरक सरीर का, नांव धर्या पषि बंधि ।
जगजीवन वैष्नौं निरपख, लहै रांम धरि संधि ॥५६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हिंदू व मुसलमान ये शरीरों के नाम है जो द्वैत अद्वैत अपने अपने पक्ष से बंधे हैं इसमें हरि भक्त वैष्णव जन ही निर्पक्ष हो राम नाम से अपना योग बनाये रखते हैं ।
.
इति मधि कौ अंग सम्पूर्ण ॥१९॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें