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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१९. मधि कौ अंग ~ ९/१२*
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कहि जगजीवन गगन मंहि, उभै अनूपम कुंड ।
गरम नरम जल एक करि, पंच३ पखालै तुंड३ ॥९॥
(३. पंच पखालै तुंड=शरीर के पाँच अवयव धोवै)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस ह्रदयाकाश में दो कुण्ड हैं जिसमे एक नरम व गरम स्वभाव दो जल हैं । दोनों को मिला कर वहां से ही इन्द्रियों को शुद्ध करें ।
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धरा* व्योम मध्य रांम, तस्य नांम प्रकासितं ।
कहि जगजीवन भगति भाव, पंच तत्त्व वासितं* ॥१०॥
(*=*. पृथिव्याकाश योर्मध्ये, रामनाम प्रकाशितम् ।
ग्राह्यां तद् भक्तिभावेन, पञ्चतत्त्वैः सुवासितम् ॥१०॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि धरती आकाश के मध्य राम का नाम ही प्रकाशित होता है । जिसकी सुवासना पंच तत्व में व्यापती है ।
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हिंदू मुस्सलमान दोइ, नांव धर्या वो एक ।
कहि जगजीवन जोति हरि, बिलसै बस्तु विवेक ॥११॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हिंदू व मुसलमान दोनों का नाम तो मनुष्य एक ही है जो परमात्मा का दिया है । किंतु परमात्मा की ज्योति सबको अपने अपने विवेकानुसार अलग अलग रुप में दिखती है ।
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हरिगुन४ हिन्दू कहावै, तुरक तरीकत५ दीन ।
कह जगजीवन हरिभगत६, रांम ह्रिदै रस लीन ॥१२॥
(४. हरिगुन=साकार ब्रह्म का उपासक) (५. तरीकत=आत्मनिष्ठ साधना) (६. हरिभगत=राम नाम का साधक)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हिन्दू हरिगुणगान करते हैं मुसलमान आत्मनिष्ठ साधना करते हैं । किंतु जो हरिभक्त हैं वे राम स्मरण कर उसमें लीन रहते हैं ।
(क्रमशः)

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