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*दादू अन्तर एक अनंत सौं, सदा निरंतर प्रीत ।*
*जिहिं प्राणी प्रीतम बसै, सो बैठा त्रिभुवन जीत ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*मू. इ. -*
*कील करण शरणे समर्थ के,*
*यूं परमेश्वर पैज सु धारी ।*
*काम न क्रोध न मोह न मत्सर,*
*निर्मल हो निज आतम तारी ॥*
*नाम निर्दोष उचार कियो अस,*
*दोष मिटे दश देह के भारी ।*
*राघो कहै परचो भयो प्रत्यक्ष,*
*गुदरी१ नैक टरै नहिं टारी ॥१८२॥*
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कीलकरण जी ने समर्थ परमात्मा के शरण होकर इस प्रकार परमात्मा के भजन की प्रतिज्ञा धारण की थी कि उसे कोई भी तुड़ा नहीं सका था ।
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एक समय आप मथुरा में यमुना स्नान करके पवित्र तट पर संतों के मध्य बैठे थे कि समाधि लग गई । लोगों ने देखकर, यह बात बादशाह को सुनाई । बादशाह उस समय आगरा से मथुरा में आकर ठहर रहा था । उसने भी आकर देखा किन्तु पाखंड समझकर इनके मस्तक में एक लोहे की कील ठुकवाई । उससे न तो आपको पीड़ा हुई और न समाधि खुली । कील मस्तक में ठोकने के कारण ही नाम कीलकरण प्रसिद्ध हुआ था । पहले मात्र करण ही होगा ऐसा संभव है । फिर समाधि खुली तब बादशाह ने आकर क्षमा माँगी । किन्तु इनमें तो काम, क्रोध, मोह, मत्सर आदि थे ही नहीं । अतः इनने बादशाह को उपालंभ भी नहीं दिया । आपने निर्मल होकर अपना उद्धार किया था ।
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आपने प्रभु का नाम भी कामना रूप दोष से रहित होकर इस प्रकार उच्चारण किया था, जिससे शरीर के महान् दश दोष - १. चोरी, २. जारी, ३. हिंसा, ४. निन्दा, ५. मिथ्याभाषण, ६. कठोर वचन, ७. वाचालता, ८. तृष्णा, ९. अनिष्टचिन्तन, १०. मतिमंदता, मिट गये थे ।
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इनकी योग्यता का प्रत्यक्ष परिचय मिलता है कि तीन बार काले सर्प के काटने पर भी आपके विष नहीं चढ़ा था । इनको आयु ऐसी व्यातीत१ हुई थी कि किसी से किंचित भी टाली नहीं टली थी अर्थात् अपनी इच्छा से ही इनने शरीर छोड़ा था ।
(क्रमशः)

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