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*दादू दिन दिन राता राम सौं, दिन दिन अधिक स्नेह ।*
*दिन दिन पीवै रामरस, दिन दिन दर्पण देह ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*कीलकरणजी की पद्य टीका*
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*इन्दव –*
*देव सुमेर हुते गुजरात हि,*
*बैठ विमान सु धाम हि चल्ले ।*
*कील रु मान हुते मथुरा महि,*
*देख अकाश उठे कहि भल्ले ॥*
*भूप कहै अजु काहि सुनावत,*
*मोर पिता हरि मांहि सु मिल्ले ।*
*मान अचंभ पठावत मानुष,*
*आय कहा सत पाँव हि झिल्ले१ ॥१७४॥*
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कीलकरणजी के पिता सुमेरदेव जी गुजरात के सूबेदार होते हुये भी भगवान् के परम भक्त थे । उनने गुजरात में ही अपना शरीर छोड़ा था ।
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वे विमान पर बैठे हुये रामधाम को जा रहे थे । उस समय कीलदेवजी मथुरा में आँमेर नरेश मानसिंह के पास बैठे थे । अपने पिता को विमान पर आकाश में देख, उठकर प्रणाम करते हुये बोले - भले पधारें ।
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यह सुनकर राजा मानसिंह ने कहा - आप आज यह किसको सुना रहे हैं ? कीलकरण जी ने कहा - प्रकट करने की बात नहीं है । किन्तु राजा मानसिंह ने नम्रता पूर्वक बताने का आग्रह किया, तब आपने कहा - मेरे पिताजी का देहान्त हो गया है । वे विमान द्वारा प्रकाश मार्ग से राम स्वरूप में मिलने के लिये रामधाम को जा रहे थे, उनको ही मैंने प्रणाम करके उक्त शब्द कहा था ।
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राजा मानसिंह ने यह आश्चर्य मानकर शीघ्र गामी साँडनी के सवारों को सुमेरदेवजी के घर गुजरात में भेजकर समाचार मँगवाये । लौटकर उन लोगों ने कहा - कि वह बात सत्य ही है । फिर राजा मानसिंह ने कीलकरण जी के पास जाकर उनके चरण छुये१ और अपने को धन्य माना ।
(क्रमशः)

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