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*सतगुरु पसु मानस करै, मानस थैं सिध सोइ ।
दादू सिध थैं देवता, देव निरंजन होइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*द्वारिकादास जी*
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*योग यमादिक साध के,*
*द्वारिकादास हरि से मिल्यो ॥*
*कूकस की नदी का, नीर में लगी समाधी ।*
*प्रभु पद से रति अचल, एक आतम आराधी ॥*
*वाम जाम१ घर वित्त, बन्धु कुल जगत निराशा ।*
*काम क्रोध मद मोह, कर्म की काटी पाशा ॥*
*गुरु कील करण प्रसाद तैं,*
*भक्ति शक्ति२ भ्रम को गिल्यो३ ।*
*योग यमादिक साध के,*
*द्वारिकादास हरि से मिल्यो ॥१९१॥*
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कीलकरण जी के शिष्य द्वारिकादास जी आँमेर से उत्तर दिशा की ओर पर्वत में कूकस ग्राम की नदी के जल में समाधि लगाया करते थे ।
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आपकी प्रभु के चरणों में अचल प्रीति थी । आपने एकात्म भाव से भगवान् की आराधना की थी ।
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स्त्री, पुत्र१, धाम, धन, बान्धव और कुलादि सांसारिक सम्बन्धों से निराश होकर, काम, कोध, मद और मोह को जय करके कर्म मय पाश को काट दिया था ।
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गुरु कील-करणजी के कृपा-प्रसाद से माया२ की भक्ति और भ्रम को आप खा३ गए थे अर्थात् नष्ट कर दिया था ।
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इस प्रकार-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, सविकल्प-समाधि इन अष्ट अंगों द्वारा निर्विकल्प समाधि में स्थित होकर राम से मिले थे और अन्त समय में ब्रह्मरन्ध्र को फोड़कर देह त्यागा था ।
(क्रमशः)

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