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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२०. सारग्राही कौ अंग ~ १/४*
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हरि हंसा मोती चुगै, मान सरोवर तीर ।
जगजीवन क्रीळा८ करै, पीवै अम्रित नीर ॥१॥
{८. क्रीळा=क्रीडा(कल्लोल)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा का नाम संसार में भव तट पर स्थित है वहाँ जीव रुपी हंस स्मरण द्वारा राम नाम रुपी अमृत पान है । और आनंद में रहकर अमरत्व को प्राप्त होता है ।
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साध सरोवर ब्रह्म जल, ऊजल९ हंस निवास ।
प्रेम पिवै मुक्ता चुगै, सु कहि जगजीवनदास ॥२॥
{९. ऊजल=उज्ज्वल(=स्वच्छ, शुद्ध,श्वेत)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि साधु सरोवर है ब्रह्म जल है, वहाँ स्वच्छ उज्ज्वल हंस निवास करते हैं वे प्रेम रुपी जल पीते हैं और राम नाम के मोती चुनते हैं ।
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कहि जगजीव हंस१० थैं, परमहंस११ जन होइ ।
मान सरोवर ते रहैं, मुक्ताहल मन मोल ॥३॥
(१०. हंस=साधारण साधक) {११. परमहंस=जीवन्मुक्त(अवधूत,योगिराज)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हंस सी उजली करणी करके जीव परम हंस परमात्मा स्वरूप होता है और आनंद रुपी मानसरोवर में रहते हैं राम नाम स्मरण के मोती ही इस सारे समागम का मूल्य है जिससे वे ये पाते हैं ।
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कहि* जगजीवन प्रथमैं, एक कहै कोइ एक ।
एक मन एक चित एक की, जाकै अंतरि टेक ॥४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि एक परमात्मा का सहारा लेकर एक चित हो एक परमात्मा की ही बात मन से कोइ एक ही करता है शेष तो संसार में अन्य कितने ही विषयों में उलझते हैं ।
(क्रमशः)

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