मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

*२०. सारग्राही कौ अंग ~ ५/८*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२०. सारग्राही कौ अंग ~ ५/८*
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कहि जगजीवन धर्या१ मैं, ए द्वै निरमल नांम ।
गुरु गोविंद सति करि सुमरि, सरि आवैं२ सब कांम ॥५॥
{१. धर्या=धरा(=पृथ्वी, संसार)} (२. सरि आवैं=पूर्ण हों)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस धरती पर दो ही निर्मल नाम है एक गुरु महाराज का और एक परमात्मा का जिससे सब कार्य पूरे होते हैं ।
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कहि जगजीवन जगत में, ए त्रिय३ बात अमोल ।
कर सौं कछु दे, दीन रहै, वचन चवै निरमोल ॥६॥
(३. त्रिय=तीन)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस संसार में ये तीन अमूल्य बातें हैं हाथ से दान करें दीन होकर रहें और मीठी वाणी बोलें ।
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कहि जगजीवन दुनी मैं, च्यारि कहै सति च्यारि ।
सतगुरु वाणी, हरि भगति, प्रीतम परस, विचारि ॥७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस संसार में चार सत्य कहे गये हैं सतगुरु महाराज के वचन, हरिभक्ति, प्रभु सानिध्य, और श्रेष्ठ विचार ।
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कहि जगजीवन विस्व मैं, पंच क्रित उत्तिम भाइ ।
कथा, कीरतन, नांम हरि, सतसंगति, गुन गाइ ॥८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संसार में पांच कार्य उत्तम कहे गये हैं । कथा, कीर्तन, नाम स्मरण, सत्संग, और प्रभु गुणानुवाद ।
(क्रमशः)

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