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*ज्यों ज्यों होवै त्यों कहै, घट बध कहै न जाइ ।*
*दादू सो सुध आत्मा, साधू परसै आइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*पूर्ण जी वैराटी*
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*परम धर्म धन धारि उर,*
*पूरण वैराटी प्रसन्न ॥*
*ऊगूणो आँथूण,*
*शैल बिच नदी बहानी ।*
*यम नियमासन प्राणायाम,*
*धारणा साधे ध्यानी ॥*
*सिंह बघेरा गर्ज,*
*रहे मन शंका नाहीं ।*
*वायु तले संचरै,*
*तासु को ऊंचे लाहीं ॥*
*पद साखी उज्वल कहे,*
*राम नाम उचर्यो रसन ।*
*परम धर्म धन धारि उर,*
*पूरण वैराटी प्रसन्न ॥१९२॥*
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पूर्णजी बैराटी उदयाचल और अस्ताचल पर्वतों के मध्य जितनी नदियाँ बहती हैं, उन सब नदियों में श्रेष्ठ गंगा नदी के समीप हिमालय पर्वत में - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा आदि की साधना करते थे और पूर्ण ध्यानी सन्त थे ।
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वहां सिंह व्याघ्र गर्जते रहते थे किन्तु आपके मन में उनके भय की शंका किंचित् मात्र भी नहीं होती थी । नीचे की ओर जाने वाली अपान वायु है, उसे ऊंचे की ओर लाकर प्राण वायु में मिलाते थे ।
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आपने निर्दोष पद और साखियाँ कही हैं । आप निरन्तर जिव्हा से राम नाम का उच्चारण करते थे । इस प्रकार परम भागवत् धर्म रूप धन को हृदय में धारण करके पूर्ण जी वैराटी अति प्रसन्न रहते थे ।
(क्रमशः)

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