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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२०. सारग्राही कौ अंग ~ ९/१२*
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कहि जगजीवन षोडि मंहि, षट रस अंग बिलास ।
विरह प्रेम वैराग हरि, लीन रहै पीव प्यास ॥९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पृथ्वी पर छ रस का ऐश्वर्य है । ये है विरह, प्रेम, वैराग्य, प्रभु, रत रहना, व परमात्मा के दर्शन की तृषा ।
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कहि जगजीवन सात मंहि, सात द्वीप नौ खंड ।
रांम नांम मंहि देखिये, इक्कीसों ब्रह्मंड ॥१०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीवन में सप्त द्वीप नो खण्ड है किंतु राम नाम स्मरण से जीव इक्कीस ब्रह्मांड देख पाता है ।
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कहि जगजीवन अष्ट मंहि, अठ सिधि नव निधि नूर ।
हरि जन को सहजैं सुगम, रांम भजन भरपूर* ॥११॥
*=*. महात्मा साषी सं० ४ से ११ तक के माध्यम से १ से ९ तक की संख्याओं की महिमा गा रहे हैं जैसे =
🌹१. एक मन होकर स्थिर बुद्धि से एक परमात्मा का एकाकी दृढ संकल्प से निरन्तर ध्यान करना=यही एक संख्या का महत्व है ।
🌹२. संसार में दो कार्य ऐसे हैं जिनके करने से मनुष्य की सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं=गुरु एवं परमात्मा का स्मरण ।
🌹३. संसार में ये तीन बातें अमूल्य हैं=१. यथाशक्ति दान, २. व्यवहार में नम्रता एवं ३. मधुर वाणी का प्रयोग ।
🌹४. संसार में चार स्थायी सत्य हैं=१. सद्गुरु का उपदेश, २. हरिभक्ति एवं ३.मूल तत्त्व का चिन्तन एवं ४. उसका साक्षात्कार ।
🌹५. संसार में पाँच बातें उत्तम हैं=१. धर्मकथा, २. हरिकीर्तन, ३. भगवन्नास्मरण, ४. सत्संगति एवं ५. भगवस्त्तुति ।
🌹६. संसार में छह रास ही श्रेष्ठ हैं=१. शरीरशुद्धि, २. विरह, ३. वैराग्य, ४. प्रेमा भक्ति, ५. लयसमाधि एवं ६. मूल तत्त्व प्राप्ति की उत्कण्ठा ।
🌹७. सात द्वीप नौ खण्ड के साथ इक्कीस ब्रह्माण्डों में ईश्वर को सर्वव्यापक समझना 'सात' संख्या का महत्त्व ।
🌹८. आठ सिद्धि श्रीदादूवाणी के अनुसार ये हैं=
सांई१ सन्तोष२ दे, भाव३ भगति४ वेसास५ ।
सिदक६ सबूरी७ सांच८ दे, मांगै दादूदास ॥
(३४/१८)
🌹९. नौ निधि श्रीदादूवाणी के अनुसार ये हैं=
आतम कै अस्थांन हैं, ग्यांन१, ध्यांन२, वेसास३ ।
सहज४, सील५, संतोष६, सत७, भाव८, भगति९ निधि पास ॥
(४/१२९)
संतजगजीवन संख्यात्मक महत्व बताते हुये कहते हैं कि कि आठ की संख्या में आठ सिद्धियां है जो विभिन्न मतों द्वारा भिन्न भिन्न बताइ गयी है । नो निधि है यानि खजाने हैं । जो दादू जी महाराज के अनुसार सहज, शील, संतोष, भाव या श्रद्धा, भक्ति, है । ये सब सामान्य जन के लिये भले ही दुष्कर हों, कठिन हों पर भक्तों को राम भजन के माध्यम से यह सहज और सुगम है ।
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सुक सारो४ अम्रित स्त्रवै, वांणी रांम निवास ।
बक मुंनि ध्यांन मछली ग्रसत, सु कहि जगजीवनदास ॥१२॥
(४. सुक सारो= शुकदेव मुनि द्वारा कथित भागवत पुराण)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि शुकदेव जी महाराज ने शास्त्रों में ज्ञानामृत भरा है जिसमे राम नाम की वाणी रहती है । और मुनि जन उस आनंद को ध्यान से बगुले जैसे तत्पर हो ग्रहण कर लेते हैं ।
(क्रमशः)

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