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*काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि ।*
*दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ सजीवन का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*पूरण पूरे ज्ञान से,*
*वैराटी गुरु-गम लियो ॥*
*अष्टांग-योग अभ्यास,*
*गुफा कंदरा के वासी ।*
*कनक कामिनी रहित,*
*सदा हरि नाम उपासी ॥*
*वाचा छले मलेच्छ,*
*कपट करि ब्याह करायो ।*
*त्यागी तिरिया रहत,*
*नहीं तन कलंक लगायो ॥*
*अनल पक्षि के पुत्र ज्यूं,*
*उलटि अपूठो बन गयो ।*
*पूरण पूरे ज्ञान से,*
*वैराटी गुरु-गम लियो ॥१९३॥*
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पूर्ण जी वैराटी पर्वत की गुफा कन्दराओं के निवासी थे । अष्टांग योग का अभ्यास करते थे । कनक कामिनी से अलग रहकर, सदा हरि नाम चिन्तन द्वारा भगवान् की उपासना करते रहते थे ।
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एक समय किसी काजी की कन्या ने आग्रह किया कि इन महापुरुष पूर्ण वैराटी जी से मेरी निका कराओ । तब मुसलमानों ने कपट पूर्ण वचनों से इनको छलकर उस कन्या से इनका ब्याह करा दिया था किन्तु उस नारी को इनने त्याग दिया और आप ब्रह्मचर्य से ही रहे, अपने शरीर पर नारी प्रसंग से बिन्दु पात का कलंक नहीं लगने दिया था ।
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जैसे अनल पक्षी का बच्चा पृथ्वी पर पड़कर भी उलटा आकाश को ही चला जाता है वैसे ही आप भी पीछे ही वन को चले गये थे ।
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इस प्रकार पूर्ण जी वैराटी गुरु से प्राप्त हुये विचार द्वारा पूर्ण ब्रह्म के पूरे ज्ञान से परब्रह्म को ही प्राप्त हुये थे । पूर्ण-वैराटी-द्वारा आप से ही चला है ।
(क्रमशः)

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