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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२०. सारग्राही कौ अंग ~ १३/१६*
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खीर नीर निरणै करै, पर उपकारी हंस ।
कहि जगजीवन ससी धर, पार ब्रह्म को अंस१ ॥१३॥
(१. पारब्रह्म को अंस=ब्रह्मविद् ब्रह्मवै भवती)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संत हंस के समान हैं वे वैसे ही निष्पक्ष निर्णय करते हैं । जैसे हंस दूध से जल पृथक कर देते हैं वैसे ही संत सत असत का भेद बता कर हम पर उपकार करते हैं । जैसे चंद्र धारण कर्ता शिव भी ब्रह्म के अंश है ।
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खात कजोडौ२ माँही क्रम, रांम बिमुख बिसआस३ ।
कृतघिणां४ नींदक५ दोजगी६, सु कहि जगजीवनदास ॥१४॥
(२. खात कजोड़ी=गोबर, कूड़ा कर्कट) (३. बिसआस=विश्वास)
{४. कृतघिणां=कृतघ्न(=फ उपकार न मानने वाला)} (५. नींदक=निन्दा करने वाला) {६. दोजगी=दोजख(नरक) में जाने वाला पापी)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव कचरा संसार के विषय जो कि कचरे के समान है को ग्रहण करते हैं, और राम विमुखियों पर श्रद्धा करते हैं, वे कृत्घ्न लोग नर्क के अधिकारी हैं ।
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कहिबो सुणिबो भलो जे, सुंणि करी करै बिचार ।
कहि जगजीवन मारि तजि, सार ग्रहै मथि दार७ ॥१५॥
{७. दार=दारु(काष्ठ) में सार उत्तम अग्नि}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कहना सुनना तभी भला है जो सुनकर चिंतन करें । यदि हम लकड़ी द्वारा मारने के गुण को छोडकर उससे चाहे तो यज्ञ आदि हेतू उत्तम अग्नि भी उत्पन्न कर सकते हैं ।
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हरि भजि प्रांण बिचार करि, अंदर ए आचार ।
कहि जगजीवन आचरन, प्रेम भगति पिव लार८ ॥१६॥
(८. पिव लार=भगवान् के साथ अनन्य प्रेमा भक्ति)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि है जीव प्रभु स्मरण करें और अंतर में भी ऐसा ही आचरण रखें । ये आचरण ही प्रेम, भक्ति आदि से जीव को परमात्मा के पीछे लगा देता है ।
(क्रमशः)

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