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*धरती अम्बर रात दिन, रवि शशि नावैं शीश ।*
*दादू बलि बलि वारणें, जे सुमिरैं जगदीश ॥*
*जे जन राते राम सौं, तिनकी मैं बलि जांव ।*
*दादू उन पर वारणे, जे लाग रहे हरि नांव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*खेम गुसांई जी*
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*खेम गुसांई राम पण,*
*रामराशि गुरु शीश धरि ॥*
*रामचन्द्र को अनुग१,*
*जगत में नाहीं छानैं ।*
*उरमें और न ध्यान,*
*एक सियाराम हि जानैं ॥*
*कार्मुक२ वामै हाथ,*
*दाहिने सायक३ राजै ।*
*यह प्रिय लागै रूप,*
*दर्श तैं सब दुख भाजै ॥*
*हनुमान् समा सो साहसी,*
*गद गद वाणी प्रेम करि ।*
*खेम गुसांई राम पण,*
*रामराशि गुरु शीश धरि ॥१९५॥*
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रामराशि जी गुरु को सिर पर धारण करके, खेम गुसांई जी ने रामचन्द्र जी की उपासना करने का ही प्रण किया था । आप रामचन्द्रजी के ही सेवक१ थे, यह बात जगत में छिपी हुई नहीं है, अति प्रकट है । इनके हृदय में अन्य कोई भी विचार नहीं आता था ।
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ये एक सीतारामजी को ही अपना सर्वस्व जानते थे । बायें हाथ में धनुष२ और दाहिने में बाण३ धारण किये हुये, रामचन्द्रजी का यह स्वरूप ही इनको प्रिय लगता था । ऐसे रामचन्द्रजी के दर्शन से आपके सब दुःख नष्ट हो जाते थे ।
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आप हनुमान् जी के समान साहसी थे । रामचन्द्रजी के प्रेम से आपकी वाणी गदगद हो जाती थी ।
(क्रमशः)

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