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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२०. सारग्राही कौ अंग ~ २१/२४*
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कहि* जगजीवन सब भले, बुरा न कहिये कोइ ।
बुरा सोइ जे रांम तजि, चित मंहि राखै दोइ* ॥२१॥
(*=*. तुल० श्रीदादूवाणी, साषी=१७=१७
दादू साध सबै करि देखणां, असाधन दीखै कोइ ।
जिहिं कै हिरदै हरि नहीं, तिंहि तन टोटा होइ ॥*
संतजगजीवन जी कहते हैंकि इस संसार में सब भले हैं किसी को भी बुरा मत कहो बुरा वह ही है जो ह्रदय से राम को त्याग कर अपने चित में दूसरे को भी रखते हैं, द्वैत रखते हैं ।
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कहि जगजीवन सब भले, सकल साध करि देखि ।
रांम* भजै विषिया तजै, ते जन बड़ा बसेखि* ॥२२॥
(*=*. तुल० श्रीदादूवाणी=राग विलावल, पद ३४७
सोई साध सिरोमनी, गोविंद गुन गावै ।
राम भजै विषिया तजै, आप न जनांवै ॥ इत्यादि ।)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस संसार में सब भले हैं सब साधुजन ने देखा है । या सब साधन कर देखा है जो सब विषयों को त्याग कर राम स्मरण करते हैं, वे जन सामान्य नहीं विशेष होते हैं ।
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कहि जगजीवन सब भले, मूरख चतुर समांन ।
रांम* भजै विषिया तजै, ते अति उत्तम ग्यांन ॥२३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संसार में मूरख व चतुर सब भले हैं जो विषय छोड़कर राम भजन करते हैं ।
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कहि जगजीवन सब भलै, सब सौं राखि सनेह ।
हरि भजि हरि मंहि राखि मन, हरि कौं सौंपी देह ॥२४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस संसार में सब भले हैं सब से ही स्नेह रखो हरि स्मरण करो हरिजी को मन में रखो । और यह देह भी प्रभु समर्पित करो । सत्कर्मो में लगाओ ।
(क्रमशः)

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