शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2021

*२०. सारग्राही कौ अंग ~ १७/२०*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२०. सारग्राही कौ अंग ~ १७/२०*
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इक अरथी९ इक अनरथी, इक साकत इक साध९ । 
कहि जगजीवन एक हरि, वो घर अगम अगाध ॥१७॥
{९=९. अर्थी=हितकारी; अनरथी=अनर्थी=अहितकारी; साकत=शाक्त (भगवान् का अभक्त); साध=साधु (=भगवान् का भक्त)} 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि एक जीव सार ग्रही है दूसरी असार ग्रही है एक भक्तसाधु है व दूसरा अभक्त है । उस प्रभु घर का घर वास्तव में सभी जीव के समझ की पहुंच से परे अगम अगाध है ।
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अस्तुति करै अकार मधि१, वेद पुरान विचारि । 
कहि जगजीवन रांम रत, नीर ग्रहै तजि गारि२ ॥१८॥
(१. अकार मधि=प्रणवोपासना)   (२. गारि=कीचड़) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो जन आकार के अनुसार वेद पुराणोक्त विधि से प्रभु की स्तुति करते हैं । और जो राममय है वे तो सारे संसार को कीचड़ की भांति त्याग कर सार रुपी जल ग्रहण करते हैं ।
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अस्तुति करै अकार मधि, कही कहै कर जोड़ि । 
कहि जगजीवन रांम रत, अरथ निबाहै वोड़ि३ ॥१९॥
(३. वोड़ि=अन्त तक) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो स्तुति प्रभु के स्वरूप को ध्यान में रखकर करते हैं, और हाथ जोड़कर कहते हैं कि हे प्रभु हम आपमें ही लीन हैं या रहें तो प्रभु भी उनको वैसा ही निभाते हैं ।
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दिल अम्रित दीदार हरि, रसनां अम्रित रांम । 
कहि जगजीवन अम्रित तन, सार बसत सब ठांम ॥२०॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि दिल में अमृत हो और प्रभु का दर्शन हो और जिह्वा उस अमृत रुपी राम नाम का स्मरण करती रहे तो संत कहते हैं कि उनके लिए तो प्रभु सार रुप में सर्वत्र व्यापते हैं ।
(क्रमशः)

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